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अंतिम जन्मदिन
गांधीजी

खून की नदी तैर कर आजादी हम तक पहुंची थी – सारा देश धू-धू कर जल रहा था| राजधानी दिल्ली जली-लुटी-बेसुध थी ... और इसके त्रासद गवाह बने गांधी विवेक की आवाज लगाते कहां-कहां भाग-भटक रहे थे ! ... और ऐसे में आया 2 अक्तूबर – उनका जन्मदिन ! ...यही उनका अंतिम जन्मदिन साबित हुआ |

सुबह से ही अभिवादन करने वालों का सिलसिला शुरु हुआ | एक ने कहा, “बापूजी, हम अपने जन्मदिन पर लोगों के चरण छूकर आशीर्वाद लेते हैं | आपके मामले में बात विपरीत हो जाती है | क्या यह उचित है ?”

गांधीजी हंसकर बोले, “महात्माओं के तरीके भिन्न होते हैं | इसमें मेरा कोई दोष नहीं | आपने मुझे महात्मा बना दिया है, भले ही मैं नकली महात्मा होऊं, तो आप लोगों को सजा तो भुगतनी पड़ेगी |”

हमेशा की तरह उन्होंने जन्मदिन उपवास, प्रार्थना और विशेष कताई करके मनाया | वे बोले, “उपवास आत्मशुद्धि के लिए है और कताई द्वारा मैं ईश्वरीय सृष्टि के सबसे दिन-हीन लोगों की सेवा में जीवन अर्पण करने के अपने प्रण को दोहराता हूं... चरखा अहिंसा का द्योतक है ... वह प्रतीक समाप्त हो गया मालूम पड़ता है |”

साढ़े आठ बजे स्नान के बाद वे अपने कमरे में आए तो कुछ अंतरंग साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे – पंडित नेहरु, सरदार पटेल, मेजबान घनश्यामदास बिड़ला तथा उनके परिवार के समस्त सदस्यगण | मीरा बहन ने गांधीजी के आसन के सामने रंग-बिरंगे फूलों से ‘हे राम’ और ‘ॐ’ सजाया था | एक संक्षिप्त प्रार्थना हुई जिसमें सबने हिस्सा लिया | गांधीजी ने सबसे अनुरोध किया कि वे प्रार्थना करें कि “ईश्वर या तो इस दावानल को शांत कर दे अथवा मुझे उठा ले | ...मैं कतई नहीं चाहता कि इस भारत में मेरा एक और जन्मदिन हो |” सरदार से बोले, “मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया था कि जो ईश्वर ने मुझे इस सारे संत्रास का साक्षी बनने के लिए जीवित छोड़ रखा है ?”

उनकी विवशता, कातरता असह्य थी | सरदार की बेटी मणिबहन ने लौटकर अपनी डायरी में लिखा, “उनकी व्यथा असह्य थी | हम उत्साह से उनके पास गए थे, बोझिल ह्रदय लेकर घर लौटे |”

उस रोज की प्रार्थना सभा में वे बोले :

आज एक सिख भाई मेरे पास आए थे | उन्होंने कहा कि मुझसे किसी ने पूछा कि आपने गुरु अर्जुनदेव की वाणी तो सुनाई परंतु दसवें गुरु गोविंदसिंहजी ने उसमें तब्दीली कर दी, इस बारे में आप क्या कहोगे ? इतिहास में सिखाया है कि गुरु गोविंदसिंह तो मुसलमानों के दुश्मन की हैसियत से पैदा हुए | लेकिन ऐसा मानने का कोई सबब नहीं, क्योंकि दसवें गुरु साहब ने करीब-करीब वही कहा है जो गुरु अर्जुनदेव ने कहा था | गुरु नानक की तो बात ही क्या ! वे तो कहते हैं कि मेरे नजदीक हिंदू, मुसलमान, सिख में कोई अंतर नहीं है | कोई पूजा करे, कोई नमाज पढ़े, सब एक हैं | एक ब्राह्मण पूजा करता है तो दूसरे धर्म वाला भगवान को कोसता है, ऐसा नहीं | मुसलमान नमाज पढ़ते हैं | पूजा और नमाज दोनों एक ही चीज है | मानुस सब एक हैं | वाणी दूसरी-दूसरी है | गुरु गोविंदसिंह ने कहा कि मानुस सब एक हैं और एक ही के अनेक प्रभाव हैं तो पीछे मैं मान लेता हूं कि हम सब एक हैं, अनेक हैं | और देखने में अनेक भेष हैं, लेकिन वैसे सब एक हैं | व्यक्ति तो करोड़ों हैं, लेकिन स्वभाव से एक हैं |

गुरु गोविंदसिंह ने कहा है, “एकै कान, एकै देह, एकै बैन |” पीछे कहा, “देवता कहो, अदेव कहो, यक्ष कहो, गंधर्व कहो, तुर्क कहो, वह सब न्यारे-न्यारे हैं; देखत को अनके भेष हैं, उसका प्रभाव एक है |” बैन के माने वाणी है, वाणी तो एक है, जबान एक है | और आतिश, वह एक है | क्या मुसलमान के यहां एक सूरज है और हम और आप लोगों के लिए कोई दूसरा सूरज है ? वह तो सबके लिए एक ही है | वह कहते हैं आब, पानी भी एक है | गंगा बहती है तो गंगा नहीं कहती है कि खबरदार, कोई तुर्क हो तो मेरा जल नहीं पी सकता, बादलों में से जल आता है तब बादल नहीं कहते हैं कि मैं आता हूं पर मुसलमानों के लिए नहीं, पारसियों के लिए नहीं, मैं तो सिर्फ हिंदुओं के लिए हूं | यूनियन सरकार हिंदुओं के ही लिए हो, ऐसा नहीं; यह हो नहीं सकता | कुरान कहो, गीता कहो, पुराण कहो, सब एक ही हैं लेकिन हमने लिबास अलग-अलग पहना दिया है | अरबी जबान में लिखे तो कुरान है, नागरी लिपि लिखो, संस्कृत में लिखो, मगर समझकर पढ़ो तो चीज एक ही है | तो वे कहते हैं कि सब एक हैं, और ऐसा कहकर खत्म करते हैं |

मैंने पूछा कि पंडितजी अगर गुरु गोविंदसिंहजी ने, आप कहते हैं वैसा किया भी हो, तो वह गलत बात थी | जब लड़ाई होती थी तो हिंदू-मुसलमान लड़ाई में मरते थे, घायल भी होते थे और जख्मी भी; लेकिन जो जिंदा होते थे उनको गुरु साहब का एक समझदार शिष्य पानी देने का काम करता था | उसने मुसलमानों को भी पानी पिलाया, हिंदुओं को भी और सिखों को भी | उसने कहा, मुझे गुरु महाराज ने ऐसा ही सिखाया है कि तेरे नजदीक न कोई मुसलमान है, न कोई सिख है, न कोई हिंदू है, सबके-सब इंसान हैं और जिसको पानी की हाजत हो, तो उसको पानी देना है | वे ऐसा थोड़े ही कहते थे कि अगर कोई हिंदू जख्मी हो गया है तो मरहम-पट्टी लगा दें, लेकिन अगर कोई मुसलमान जख्मी पड़ा है तो उसे वैसे ही छोड़ दो ! उन्होंने पूछा, लेकिन गुरूजी तो मुसलमानों के साथ लड़े थे ? तो लड़े तो सही, लेकिन उन मुसलमानों के साथ लड़े जिन्होंने इंसानियत और इंसाफ के रास्ते को छोड़ दिया था, जिन्होंने अपना मजहब छोड़ दिया था | वे दानी पुरुष थे, निर्लिप्त थे, अवतारी पुरुष थे, उनके लिए मेरे-तेरे का सवाल नहीं था | लेकिन हां, वे अपनी रक्षा तो करते थे, लड़ाई करते थे, इसमें कोई शक नहीं | सिख दावा करें कि नहीं, हम तो अहिंसक हैं तो वह गलत बात होगी | आप कृपाण रखते हैं, लेकिन गुरूजी ने सिखाया कि कृपाण रक्षा के लिए है, मासूम की रक्षा के लिए है | जो दूसरों को तंग करता है उस जालिम के साथ लड़ने के लिए वह कृपाण है | कृपाण बूढ़ी औरतों को काटने के लिए नहीं है, बच्चों को काटने के लिए नहीं है, औरतों को काटने के लिए नहीं है, जो निर्दोष बेगुनहगार हैं | जिस पर इल्जाम साबित हो गया है कि यह गुनहगार है, पीछे वह मुसलमान हो, कोई भी हो, सिख भी क्यों न हो, उसके पेट में वह कृपाण चली जाएगी | आप लोग कृपाण जिस तरीके से आज खोलते हैं वह तो जहालत की बात है | ऐसे लोगों के पास से कृपाण छिनी जाए तो कोई गुनाह नहीं माना जाएगा, क्योंकि उन्होंने धर्म तो छोड़ दिया है, सिख ने कृपाण का दुरूपयोग किया है |

आज तो मेरी जन्मतिथि है | मैं तो अपनी जन्मतिथि मनाता नहीं हूं | मैं तो कहता हूं कि फाका करो, चरखा चलाओ, ईश्वर का भजन करो, जन्मतिथि मनाने का मेरे ख्याल में यही सच्चा तरीका है | मेरे लिए तो आज यह मातम मनाने का दिन है | मैं आज तक जिंदा पड़ा हूं, इस पर मुझे खुद आश्चर्य होता है, शर्म लगती है | मैं वही शख्स हूं कि जिसकी जबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोड़ों उसे मानते थे | आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है | मैं कहूं कि तुम ऐसा करो नहीं, तो ‘नहीं करेंगे’ ऐसा कहते हैं लेकिन कहते हैं कि हम तो बस हिंदुस्तान में हिंदू ही रहने देंगे और बाकी किसी को रहने की जरूरत नहीं है | आज तो ठीक है कि मुसलमानों को मार डालेंगे, कल पीछे क्या करोगे ? पारसी का क्या होगा और क्रिस्टी का क्या होगा और पीछे कहो अंग्रेजों का क्या होगा ? क्योंकि वह भी तो क्रिस्टी हैं ? आखिर वह भी क्राइस्ट को मानते हैं, वह हिंदू थोड़े हैं ! आज तो हमारे पास ऐसे मुसलमान पड़े हैं जो हमारे ही हैं, आज उनको भी मारने के लिए हम तैयार हो जाते हैं तो मैं यह कहूंगा कि मैं तो ऐसे बना नहीं हूं | जब से हिंदुस्तान आया हूं, मैंने तो वही किया कि जिससे हिंदू, मुसलमान सब एक बन जाएं | धर्म से एक नहीं, मिलकर भाई-भाई होकर एक रहने लगें | लेकिन आज तो हम एक-दूसरे को दुश्मन की नजर से देखते हैं | कोई मुसलमान कैसा भी शरीफ हो, हम समझते हैं कि कोई मुसलमान शरीफ हो ही नहीं सकता | वह तो हमेशा नालायक ही रहता है | ऐसी हालत में हिंदुस्तान में मेरे लिए जगह कहां है और मैं उसमें जिंदा रहकर क्या करूंगा ? आज मेरे से 125 वर्ष की बात छूट गई है | 100 वर्ष की भी छूट गई है और 90 वर्ष की भी | आज मैं 79 वर्ष में तो पहुंच जाता हूं, लेकिन वह भी मुझको चुभता है | मैं तो आप लोगों को, जो मुझको समझते हैं, और मुझको समझने वाले काफी पड़े हैं, कहूंगा कि हम यह हैवानियत छोड़ दें | मुझे इसकी परवाह नहीं कि पाकिस्तान में मुसलमान क्या करते हैं | मुसलमान वहां हिंदुओं को मार डालें, उससे वे बड़े होते हैं, ऐसा नहीं, वह तो जाहिल हो जाते हैं, हैवान हो जाते हैं तो क्या मैं उसका मुकाबला करूं ? हैवान बन जाऊं, पशु बन जाऊं, जड़ बन जाऊं ? मैं तो ऐसा करने से साफ इनकार करूंगा और मैं आपसे भी कहूंगा कि आप भी इनकार करें | अगर आप सचमुच मेरी जन्मतिथि को मनाने वाले हैं तो आपका तो धर्म यह हो जाता है कि अब से हम किसी को दीवाना बनने नहीं देंगे, हमारे दिल में अगर कोई गुस्सा हो तो हम उसको निकाल देंगे | मैं तो लोगों से कहूंगा – भाई, आप कानून को अपने हाथ में न लें, हूकूमत को इसका फैसला करने दें | इतनी चीज आप याद रख सकें तो मैं समझूंगा कि आपने काम ठीक किया है | बस, इतना ही मैं आपसे कहना चाहता हूं |

(प्रार्थना-प्रवचन- 1 पृष्ट 371-74)

सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८