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मेरा धर्म
गांधीजी

हमारी पहचान हमारे धर्म से होती है | फिर धर्म की पहचान किससे होती है ? गांधीजी कहते हैं कि धर्म की पहचान हमसे होती – इंसान से

मैं लकीर का फकीर नहीं हूं | इसलिए संसार के विभिन्न धर्मग्रंथों की भावना को समझने का प्रयत्न करता हूं | मैं उन्हें सत्य और अहिंसा की कसौटी पर कसता हूं, जो इन ग्रंथों में ही निहित है | जो कुछ उस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, उसे मैं अस्वीकार कर देता हूं; जो खरा उतरता है उसे ग्रहण कर लेता हूं | वेदों को पढ़ने का साहस करने के कारण राम द्वारा एक शुद्र को दंड दिए जाने के आख्यान को मैं एक क्षेपक मानकर अस्वीकार करता हूं | मैं जिस राम की उपासना करता हूं, वे मेरी कल्पना के पूर्ण पुरुष हैं | मैं उस ऐतिहासिक राम की उपासना नहीं करता, जिसके जीवन विषयक तथ्य ऐतिहासिक अन्वेषणों और अनुसंधानों की प्रगति के साथ-साथ बदलते रह सकते हैं | तुलसीदास का भी ऐतिहासिक राम से कोई मतलब नहीं था |

इतिहास की कसौटी पर कसें तो उनकी रामायण रद्दी के ढेर पर फेंक देने लायक रह जाएगी | लेकिन आध्यात्मिक अनुभूति की झांकियां देने वाली कृति के रूप में उनकी पुस्तक अद्दितीय है – कम-से-कम मेरे लिए तो वह ऐसी ही है | तब भी तुलसीदास की ‘रामायण’ के नाम से प्रकाशित होने वाले अनेकानेक संस्करणों में मिलने वाले हर एक शब्द को मैं ठीक नहीं मानता | मैं तो पुस्तक में जो भावना व्याप्त है, उस पर मंत्रमुग्ध हूं | शूद्रों के वेदाध्ययन पर लगाए गए प्रतिबंध को मैं स्वीकार नहीं कर सकता | मैं तो मानता हूं कि अभी जब तक हम गुलाम हैं, तब तक हम सभी मुख्यत: शुद्र ही हैं | ज्ञान पर किसी भी श्रेणी या वर्ग का विशेषाधिकार नहीं हो सकता | मैं यह तो समझ सकता हूं कि जिस प्रकार पहले से तैयारी किए बिना कोई भी व्यक्ति ऊंचाई पर, जहां हवा का घनत्व बहुत कम है, सांस नहीं ले सकता; या जिन्होंने सामान्य गणित की शिक्षा न ली हो, वे रेखागणित या बीजगणित नहीं समझ सकते, उसी प्रकार धार्मिक क्षेत्र में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त किए बिना लोगों के लिए उच्चतर या सूक्ष्मतर सत्यों को ग्रहण करना असंभव है | मैं कुछ स्वस्थ परंपराओं में विश्वास रखता हूं | मैं ‘भागवत’ के द्वादश मंत्र के जाप से अथवा तुलसीदास की सरलतर पद्धति के अनुसरण से और ‘गीता’ तथा अन्य पुस्तकों के कुछ चुने हुए श्लोकों और भाषा के कुछ भजनों के पाठ से ही संतोष करता हूं | ये मेरे दैनिक आध्यात्मिक आहार हैं | ये ही मेरी ‘गीता’ हैं | मुझे जिस शांति और आत्मतोष की प्रतिदिन आवश्यकता होती है, वह सब इनसे पूरा-पूरा मिल जाता है |

(गांधी वांड्मय, खंड 28, पृष्ठ 116)


धर्म के नाम पर हम हिंदुओं ने खूब आडंबर रच रखा है | धर्म को केवल खानपान का विषय बनाकर हमने उसकी प्रतिष्ठा कम कर दी है | हमें आंतरिक पवित्रता का अधिक विचार करना चाहिए | हम अनेक आंतरिक प्रलोभनों से घिरे हुए हैं; घोर-से-घोर अस्पृश्य और पापपूर्ण विचारों का प्रवाह हमें स्पर्श कर रहा है, अपवित्र बना रहा है, उस सर्वशक्तिमान परमात्मा के दरबार में हमारी पहचान इस बात से नहीं होगी कि हमने क्या-क्या खाया-पीया है और किस-किस का स्पर्श किया है, बल्कि इस बात से होगी कि हमने किस-किस की सेवा किस-किस तरह से की | यदि हमने किसी भी विपत्तिग्रस्त और दुखी मनुष्य की सेवा की होगी तो वह अवश्य हम पर कृपा-दृष्टि डालेगा | जिस प्रकार हमें बुरे लोगों और बुरी बातों के संसर्ग से बचना चाहिए उसी प्रकार खराब, उत्तेजक और गंदे खान-पान से भी दूर रहना चाहिए | लेकिन हमें इन नियमों की महिमा को भी आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए | हम भोजन के रूप में अमुक वस्तुओं के त्याग का उपयोग अपने कपट-जाल, धूर्तता और पापाचरण को छिपाने के लिए नहीं कर सकते | और इस आशंका से कि कहीं उनका स्पर्श हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक न हो, हमें किसी पतित या गंदे भाई-बहन की सेवा से हरगिज मुंह न मोड़ना चाहिए |

(गांधी वांड्मय, खंड 22)


योग-साधना मुझे नहीं आती | मैं जो साधना करता हूं वह मैंने बचपन में अपनी धाय से सीखी थी | मुझे भूत-प्रेत से डर लगता था | वह मुझसे कहा करती थी: ‘भूत-प्रेत नहीं होते, पर यदि तुम्हें डर लगता है तो रामनाम जपो’ | बचपन की इस सीख ने मेरे अंतर्मन में एक विराट रूप ले लिया | यह एक ऐसा सूर्य है जिसने गहनतम अंधकार की मेरी घड़ियों को आलोकित किया है | ईसाई ईसा का नाम और मुसलमान अल्लाह का नाम जप कर इसी तरह की सांत्वना पा सकता है | शर्त सिर्फ यह कि जप केवल होठों से नहीं, आपके अंतर से होना चाहिए | तुलसीकृत रामायण के पाठ से मुझे सबसे अधिक शांति मिलती है | न्यू टेस्टामेंट और कुरान के पाठ से भी मुझे शांति मिली है | उनकी हर बात, उदाहरण के लिए पॉल के धर्म-पत्रों की हर बात मुझे अपील नहीं करती | तुलसीदास की भी हर बात मुझे अपील नहीं करती | ‘गीता’ ऐसा विशुद्ध धर्मोपदेश है जिसमें कोई दोष नहीं है | वह तो परमात्मा की ओर जीवात्मा की यात्रा का वर्णन है | अत: उसमें चयन का प्रश्न ही नहीं उठता | धार्मिक ग्रंथ के किसी भी वचन को मैं अपने विवेक पर हावी नहीं होने दे सकता | मैं मानता हूं कि प्रमुख धर्मग्रंथ ईश्वर प्रेरित हैं, किंतु उसके साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि वे दो माध्यमों से छनकर आते हैं | पहले तो वे किसी मानव संदेशवाहक के माध्यम से आते हैं, और फिर व्याख्याकारों की टीकाओं से गुजरते हैं | उनमें कुछ भी ऐसा नहीं होता जो सीधे ईश्वर से आता हो | दिव्य ज्ञान में विश्वास रखते हुए भी मैं अपने विवेक को तिलांजलि नहीं दे सकता; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि ‘शब्द मारता है, पर उसका निहितार्थ तारता है |’ आप मुझे गलत न समझें, मेरी आस्था में ऐसी चीजों में भी विश्वास है जिनमें तर्क के लिए कोई स्थान नहीं, जैसे कि ईश्वर की सत्ता ! कोई भी तर्क मुझे उस आस्था से डिगा नहीं सकता | उस बच्ची की तरह, जो सारे तर्क के प्रतिकूल बार-बार यही कहती रही कि ‘फिर भी हम सात हैं,’ मैं किसी बहुत अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से तर्क में परास्त होकर भी बार-बार यही कहना चाहूंगा कि ‘फिर भी ईश्वर है |’

(हरिजन, 5 दिसंबर 1956)

सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८