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यहां गांधी का काम हुआ था ...
रामचंद्र राही

गांधी की मांग थी सात लाख कार्यकर्ताओं की... विनोबा उनकी खोज में निकल पड़े ... ग्रामीण मानस को उद्वेलित करने वाला ऐसा वृहद, गहरा और निरंतरता से चलने वाला कोई दूसरा अभियान इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है | विनोबा के जन्मदिन (11 सितेंबर) पर श्रद्धापूर्वक उनकी छोटी-सी याद समेटता यह आलेख गांधी:150 के गंतव्य की याद भी कराता है.

“यार, ये नक्सलबाड़ी वाली बातें तो बासी पड़ गई | चलो, तुम्हें एक नई चीज दिखाता हूं |” अविनाश, विधार्थी जीवन का मेरा साथी | इलाहाबाद विश्वविधालय में हम दोनों एक ही साथ पांच साल तक छात्रावास में रहे हैं | वह पूर्णिया के एक अच्छे जमींदार का लड़का है | एल.एल.बी. करने के बाद पैसा नहीं प्रतिष्टा कमाने पर तुला है | समाज सेवा की धुन लगी है |

मैं चल पड़ता हूं | कटिहार से भवानीपुर तक पक्की सड़क है, तो जीप से आते हैं | भवानीपुर से पांच मील बैलगाड़ी पर और फिर तीन-चार मील पैदल |

“यह भी भारत है !” अविनाश कहता है |

“तो मैं कहां कहता हूं कि चीन है !! ...लेकिन इस घोर देहात में मुझे घसीटने से तुम्हें क्या मिला ? पांव की मेरी नसें तन गई हैं | अब चला नहीं जाता | कहां दिल्ली की भागती भीड़, कहां इस घोर देहात का जकड़ता स्तब्ध सूनापन |”

“जनाब, दिल्ली इन्हीं गांवों से रस खींच कर जी रही है | ये गांव न रहे तो तुम्हारी दिल्ली भीगी बिल्ली बन जाए |”

हम गांव के करीब पहुंच रहे हैं | एक बुढ़िया माथे पर पटसन का बोझ लादे गांव की ओर जा रही है | अविनाश को देखते ही कहती है, ‘परनाम सरकार |’ इधर ‘परनाम सरकार’ ‘परनाम हजूर’, परनाम मालिक’ का रिवाज है | जवाब में लोग दो बार ‘परनाम परनाम’ बोलते हैं |

अविनाश बुढ़िया से पूछता है: “रामउजागर चौधरी गांव पर हैं ?”

“जी मालिक, हैं !” बुढ़िया धीमी आवाज में कहती है |

डग-डग डम-डम डग-डग...... डम-डम...... जैसी आवाज सुनाई पड़ती है | “क्यों, गांव में कोई नाच-तमाशा हो रहा है ? यह बाजा ?”

बुढ़िया हंस पड़ती है, “नाच तमाशा न मालिक, पंचैती के डुग्गी बजै छै |”

“कैसी पंचायत ?” मेरे प्रश्न का जवाब अविनाश ने दिया, “अब जब गांव में पहुंच ही रहे हो, तो धीरे-धीरे सब मालूम हो जाएगा ! होगी गांव की सभा किसी समस्या पर विचार करने के लिए | बड़ी और बड़े लोगों की बहुत सभाओं में रिपोर्ट लेने गए होगे, आज इस छोटे-से गांव की, एक छोटी-सी सभा भी देख लो | भारत की संसद नहीं, इन निपट गंवारों की ग्राम संसद भी देख लो |”

रामउजागर चौधरी का दरवाजा | बांस और घास-फूस के बने झोपड़ों का यह पूरा गांव है | दरवाजे पर बांस की बनी एक मचान पर हम बैठे | हवा में नमी है | थककर चूर हो गया हूं | इसलिए थोड़ी देर बैठने के बाद, लेट जाता हूं तो झपकी-सी आने लगती है |

कुछ देर में झोपड़े से एक अधेड़ सज्जन बाहर आते हैं | ‘परनाम...परनाम’ का अभिवादन होता है | कुशल समाचार पूछते हैं, और फिर झोपड़े के अंदर चले जाते हैं |

“लीजिए, जलखइ कर लीजिए,” रामउजागर चौधरी कांसे के एक कटोरे में चुड़ा-गुड़ लाकर रखते हैं | पीतल के चमकते लोटे में जल भी है | अविनाश ने मेरे बारे में शायद बता दिया है कि मैं दिल्ली से आया हूं |

“धन्न भाग सुदामा के घर सिरी किशुन जी पधारे ! हम गरीब लोग का पास अउर का है कि स्वागत करें श्रीमानजी का | चाह-वाह तो यहां मिलती नहीं | थोड़ी देर में भैंस दूहेगी तो थोड़ा गरम-गरम दूध... |” बहुत ही संकोच के साथ चौधरीजी अपनी भावना जाहिर करते हैं |

अचानक मेरी आंखें गीली हो गई | कोई परिचय, कोई रिश्ता-नाता नहीं लेकिन भावना का सागर उमड़ पड़ा | इच्छा हुई कि कहूं – ‘हम कृष्ण नहीं, राह भटके कौरव हैं मेरे भाई !’ लेकिन कह नहीं पाता | चूड़ा चबाने लगता हूं |

फिर पंचैती शुरु होती है | थोड़ा-सी धान का पुआल बिखेर दिया है | एक लालटेन नीम के पेड़ की निचली टहनी में लटका दी गई है | मद्धिम रोशनी फैल रही है |

‘पंचैती’ है कि हाल ही में विधवा हुई निपूतीन अभागिन रधिया का दाना-पानी कैसे चले ? मरद जिंदा था तो कमा कर खिलाता था | अब सहारा कौन देगा ? रधिया के दोनों पांव में गठिया है | चल-फिर कर कमाई नहीं कर सकती है | तर्क-वितर्क होता है, और अंत में सब मिलकर तय करते हैं कि रधिया इस गांव की बेवा है, अभागिन है तो क्या हुआ, गांव की इज्जत है | इसलिए गांव उसकी जिम्मेदारी लेगा | ‘ग्रामकोष’ से उसे खोराकी दी जाएगी !

“यह ग्रामकोष क्या है ?” जवाब में अविनाश ने कहा, “बात यह है कि यह गांव ग्रामदानी गांव  है | तुम इसे आंखों से देखो और दिमाग से समझो | ज्यादा बुद्धि वालों को यकीन नहीं होता है कि जो यहां चल रहा है, वह वास्तविक है |”

“ग्रामदानी यानी क्या इन लोगों ने अपना गांव तुम्हें दान कर दिया है ?”

“मेरे भोले भाई, यही तो राज है, दिल्ली वाले गांव का दिल क्या समझेंगे ! ग्रामदान एक नया गांव, एक नया देश बनाने का आंदोलन है, जिसे गांधी के शिष्य विनोबाजी चला रहे हैं |”

“तुम हैरत में पड़ जाओगे कि इस गांव के लोगों ने गैर-सरकारी ग्रामसभा बनाकर, उसे अपनी-अपनी जमीन की मिल्कियत सौंप दी है | यहां हर जमीन वाले ने अपनी जमीन का 5% भाग यहां के भूमिहीनों में बांट दिया है | यहां हर किसान अपनी फसल में से चालीसवां और हर मजदूर अपनी मजदूरी में से तीसवां हिस्सा निकाल कर एक जगह जमा करता है | इसे ही ग्रामकोष कहते हैं, कहो कि गांव का अपना बैंक ! रधिया को ‘खोराकी’ देने के अभी जो व्यवस्था हुई, वह इसी ग्रामकोष में से की गई है,” अविनाश पूरी बात समझता है |

मैं कौतूहल से भर उठा | मैं गांववालों से तरह-तरह के सवाल पूछता हूं | एक नौजवान जवाब देता है, “गांव की सम्मिलित मालिकी न बनाएं तो अलग-अलग रहकर भिकारी बनें ? अलग-अलग मालिकी रखें तो सारी जमीन साहूकार हड़प लेता है कर्ज के सूद में | सुना हूं कि कम्यूनिस्टों का राज होगा तो सारी जमीन उनकी सरकार छीन लेगी | इससे कहीं अच्छा क्या यह नहीं है कि जमीन की मालिकी गांव-समाज की ही रहे ! आखिर उसमें रहेंगे हम ही लोग न ?”

“सब काम एक राय होकर करोगे ? झगड़े नहीं होंगे ?”

“होंगे ! हम सब देवता थोड़े बन गए हैं | लेकिन जब साथ मरना-जीना है, तो साथ रहने और सबकी राय से काम करने में क्या दिक्कत है ? सबकी भलाई है इसमें,” एक अधेड़ आदमी ने बात जोड़ दी |

“सरकार के भरोसे तो बहुत बैठे | बहुत झक मार लिया साहब हमने ! नेताओं को कहां फुरसत है अपने लड़ाई-झगड़े से | इसलिए सोचा कि “कर बहियां बल आपनो, छाड़ि बिरानी आस,” इस बार रामउजागर चौधरी बोले |

समाजवाद के नारे बहुत सुने, लोकतंत्र की गाथा गाते-गाते मैं खुद भी नहीं अघाता हूं | लेकिन यहां आकर सब बातें हवाई लगती हैं | कुछ है जो आंखों के सामने घट रहा है | आंखों ने देखा नहीं होता तो अविनाश की बात मैं गप्प मान कर उड़ा देता | लेकिन यहां मानने, न मानने जैसी गुंजाइश कहां है ! लगता है कि समाजवाद और वास्तविक लोकतंत्र का भारतीय स्वरूप यहीं से, इन्हीं प्रयासों से उभरेगा | गांवों से......नेताओं से नहीं, दिल्ली से भी नहीं |

पंचैती में मैंने एक बूढ़े से पूछा कि आपने गांधीजी का नाम सुना है ?

“दर्शन किया है बाबू, भाषण सुना है ! दो साल पहले वे भवानीपुर आए थे |”

“दो साल पहले?” मैं चौंका ! अविनाश ने समझाया, “अरे दो साल पहले विनोबा आए थे ! गांव के अधिकतर लोग उन्हें ही गांधी समझते हैं |”

गांववाले विनोबा को गांधी के रूप में देखते हैं, मैं गांववालों में गांधी का दर्शन कर रहा हूं |

सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८