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मेरी यादों में गांधीजी

हमारी पीढ़ी ने और हमारे बाद की सारी पीढ़ियों ने गांधीजी को न देखा, न सुना और न गुना; क्योंकि गांधी से विपरीत जाने वाले भारत देश में गांधीजी केवल एक नाम बन गए | लेकिन जिन्होंने उनको देखा, सुना और  अपनी-अपनी तरह से गुना उनके लिए गांधीजी क्या थे ? कुछ लोग, कुछ बातें !

खान अब्दुल गफ्फार खां

गांधीजी के साथ मेरे जैसे स्नेहपूर्ण और हार्दिक संबंध रहे, वैसे केवल जवाहरलाल नेहरु और राजेंद्र प्रसाद के साथ रहे |

मैंने गांधीजी को सबसे पहले 1920 में दिल्ली में खिलाफत सम्मेलन में देखा था | उनके साथ जवाहरलाल नेहरु, मौलाना आजाद और अन्य लोग भी थे | मुझे उनसे मिलने का अवसर नहीं मिला लेकिन मैंने अनुभव किया कि यही लोग हैं जो देश की स्वतंत्रता और सुख-समृद्धि के लिए तन-मन-धन से काम करेंगे |

दूसरी बार मैं 1928 में कलकत्ता में उनसे मिला | कांग्रेस और खिलाफत सम्मेलन का अधिवेशन था | हम गांधीजी का भाषण सुन रहे थे कि गुस्से से भरा एक नौजवान मंच पर चढ़ आया और गांधीजी को टोकते हुए बोला, ‘महात्माजी, आप कायर हैं, कायर !’ गांधीजी उसकी बात पर खूब हंसे, पर उन्होंने अपना भाषण जारी रखा | मैं गांधीजी का शांत स्वभाव देखकर आश्चर्यचकित रह गया |

अगस्त, 1934 में हजारीबाग जेल से छूटने के बाद मैं पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत को छोड़कर कहीं भी जा सकता था | मुझे गांधीजी ने तार भेज कर अपने पास वर्धा बुलाया और मैं वर्धा चला गया | मैं प्राय: गांधीजी की प्रार्थनाओं में भाग लेता था | एक दिन गांधीजी मुझसे बोले – “आप जानते हैं, शौकत अली और मोहम्मद अली के साथ मेरे अत्यधिक हार्दिक संबंध थे | लेकिन फिर क्या हुआ, मैं नहीं जानता लेकिन वे मुझसे नाराज होकर अलग हो गए | इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है ? आप मेरे साथ कैसा व्यवहार करेंगे ?” मैं बोला – “प्रश्न स्नेह का है | दो व्यक्तियों के बीच संबंधों का बना रहना उनके विचारों और दृष्टिकोण पर निर्भर है | आपका जो दृष्टिकोन या विचार है, वही मेरा भी है | आपका ध्येय सेवा, मानव-प्रेम और इंसान की खुशहाली है | मैं भी यही चाहता हूं | जब तक हमारा और आपका यही दृष्टिकोण रहेगा, हममें झगड़ा नहीं होगा | मतभेद की स्थिति में ही लोग एक-दूसरे से अलग होते हैं |”

वर्धा में मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि वे हर काम समय पर करते थे | भोजन करने, सोने और प्रार्थना का उनका समय निर्धारित था |

वे थोड़े भी रूढ़िवादी और कट्टरपंथी नहीं थे | मुझे एक उदाहरण याद आता है | वर्धा में जब मैं गांधीजी से मिलने जाता था, तो मेरे बच्चे भी मेरे साथ जाते थे | एक दिन गांधीजी का जन्मदिन पड़ा | उस दिन जब हम गांधीजी के साथ भोजन करने लगे, तो मेरे पुत्र गनी ने उनसे कहा – “मुझे बहुत खुशी है कि मैं यहां आया | मैंने सोचा था कि आपके जन्मदिन पर हमें मिठाई, पुलाव और मुर्गा आदि मिलेगा लेकिन आज भी यहां रोज की तरह कददू बना है |” यह सुनकर गांधीजी बहुत हंसे और मुझसे बोले – “देखो, ये बच्चे हैं | हमें इन्हें वही खाने को देना चाहिए, जो ये चाहते हैं | हमें इनके लिए मांस और अंडों का प्रबंध करना चाहिए |” मैंने कहा – “ये केवल मजाक कर रहे हैं | हम जहां भी जाते हैं, वहां वही खाते हैं, जो मेजबान परोसते हैं और स्वयं भी खाते हैं | यदि आप इनसे और कुछ खाने को कहेंगे, तो ये नहीं खाएंगे |” इसलिए मैं और मेरे बच्चे गांधीजी से सहमत नहीं हुए | लेकिन गांधीजी उनकी इच्छानुसार उन्हें खाना देने को तैयार थे |

मैं गांधीजी के विनोदी स्वभाव से भी बहुत प्रभावित हुआ | वह लड़के-लड़कियों, बूढ़े-जवान सभी के साथ हंसते थे | काफी विनोदप्रिय थे |

एक दिन ऐसा हुआ कि वर्धा आश्रम का भंगी अपना काम छोड़कर भाग गया | गांधीजी को इसकी सुचना दी गई तो वे बोले, “हमें बाल्टी-झाड़ू लेकर स्वयं सफाई करनी चाहिए |” और हम सबने मिलकर सफाई की |

गांधीजी 1938 में दूसरी बार सीमा प्रांत के दौरे पर आए | हमने उनके रात के विश्राम स्थल पर हथियारबंद संतरी तैनात किए | यह एक सुरक्षात्मक कार्रवाई थी | जब गांधीजी ने उन्हें देखा तो बोले – “इनकी क्या आवश्यकता है ?” मैंने कहा, “बापू, ये अनधिकृत व्यक्तियों को अंदर आने से रोकने के लिए रखे गए हैं |” लेकिन गांधीजी इससे सहमत नहीं हुए | बोले – “मुझे इनकी जरूरत नहीं है |” इस घटना का हम पर गहरा प्रभाव पड़ा |

सीमा प्रांत में पहले हिंसा की अनेक घटनाएं होती थीं | अहिंसा का संदेश वहां बाद में पहुंचा | हिंसा के बाद अंग्रेजों का दमनचक्र चलता था, जिसने बहादुर लोगों को भी कायर बना दिया था | लेकिन जब अहिंसा का शुभागमन हुआ, तो कायर से कायर पठान भी बहादुर बन गया | इससे पहले पठान, सिपाहियों से और जेल से इतना डरते थे कि उनमें सिपाहियों से बातचीत करने तक का भी साहस नहीं था | लेकिन अहिंसा ने उनमें साहस, वीरता और भाईचारे की भावना को जन्म दिया और बच्चे भी हंसी-खुशी जेल जाना पसंद करने लगे |

मैं जब 1945 में जेल से छूटा तो अस्वस्थ था | गांधीजी उन दिनों बंबई में बिड़ला भवन में ठहरे हुए थे | उन्होंने मुझे बंबई बुलाया | एक दिन उनसे देश में हिंसा की स्थिति पर चर्चा हुई | मैंने गांधीजी से कहा – “आप लोगों को अहिंसा की शिक्षा देते हैं | आपके पास अनेक सबक हैं | ये धनी लोग हैं ! ये दूसरों को प्रर्याप्त भोजन दे सकते हैं लेकिन देश के लिए ये अपना पैसा खर्च नहीं करते | इनके पास हिंसा के अनेक साधन भी हैं लेकिन आप सीमा प्रांत में वैसी हिंसा नहीं पाएंगे, जैसी हिंसा का यहां काफी जोर है | ऐसा क्यों है ?” मेरे इस प्रश्न पर गांधीजी हंसे और बोले – “लोग कहते हैं कि अहिंसा कायरों के लिए है | लेकिन वास्तव में यह बहादुरों के लिए है | सीमा प्रांत में हिंसा नहीं है, क्योंकि वहां के लोग बहादुर हैं |”

विभाजन के समय बिहार के दंगों में हम गांवों का दौरा कर रहे थे | कुछ मुसलमान शरणार्थी गांधीजी के पास आए और बोले – “गांधीजी, हमें क्या करना चाहिए ? यहां इतनी अधिक हिंसा, हत्या और असुरक्षा है |” गांधीजी बोले – “मैं केवल बहादुरी का ही पाठ पढ़ा सकता हूं | आप अपने घर वापस जाएं |” उन्होंने पूछा – “हम यह कैसे कर सकते हैं ? हमारे जीवन की क्या गारंटी है ?” गांधीजी बोले – “मैं क्या गारंटी दे सकता हूं | यदि आपमें से कोई मारा जाता है, तो हिंदुओं को इसका मूल्य गांधी के जीवन से चुकाना होगा, मैं आपको केवल यही आश्वासन दे सकता हूं |” इससे मुसलमान शरणार्थियों को काफी भरोसा हुआ और वे अपने घरों को वापस चले गए |

गांधीजी की वाणी प्रेम और उदारता से भरी थी | उनकी सेवा, प्रेम और भक्ति से असंख्य लोग प्रभावित हुए |

जब रेडियो से गांधीजी की हत्या का समाचार प्रसारित हुआ, उस समय मैं एक छोटे-से गांव में भोजन कर रहा था | हम स्तब्ध रह गए | मैंने खाना छोड़ दिया और बाहर आकर हमने खुदाई खिदमतगारों को इकट्ठा किया | हमें गहरा धक्का लगा | हमने अनुभव किया कि हमारा सच्चा स्नेही सहायक और मित्र हमें छोड़ गया है |

गांधीजी की हत्या अक्षम्य थी | जिस व्यक्ति ने अपना समूचा जीवन मानवता के लिए अर्पित कर दिया, जेलों में गया और देश की नि:स्वार्थ सेवा की, उसकी हत्या एक क्रूरतम अपराध था | इस समय भारत को जिस कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, उसका कारण यही हो सकता है कि खुदा ने इस जधन्य कार्य के लिए हमें माफ नहीं किया है |

गांधीजी की सबसे बड़ी देन क्या है, कहना मुश्किल है | उन्होंने भारतवासियों में कायरता के स्थान पर साहस भरा तथा आजादी की मांग करने की हिम्मत दी | उन्होंने भारत को ही नहीं, समूचे विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया | उन्हीं के प्रयासों से हमें आजादी मिली |

लोग गांधीजी की आलोचना करते हैं, तो करें | दुनिया की ऐसी है रीति है | सभी महापुरुषों के बारे में यही होता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि उनकी प्रशंसा करके हम उन्हें अधिक उच्चता प्रदान नहीं कर सकते और उनकी आलोचना करके दुनिया की नजर में उन्हें गिरा भी नहीं सकते हैं | गांधीजी महान थे और महान ही रहेंगे |

हम उनका सम्मान किस प्रकार कर सकते हैं ? जनता को जीवन की बुनियादी जरूरतें प्रदान की जानी चाहिए, जो गांधीजी चाहते थे | यदि हम किसी ग्रामीण के सामने गांधी-दर्शन की चर्चा करें, तो वह यही कहेगा- मैं भूखा हूं | पहले मुझे खाना दो | मुझे कपड़े दो | मेरे बच्चों के लिए स्कूल नहीं है | उन्हें स्कूल दो | मैं बीमार हूं और गांव में डॉक्टर या चिकित्सा की व्यवस्था नहीं है | इसलिए मेरी राय में गांधी जन्मशताब्दी तभी सफल होगी जब लोगों के जीवन को बुनियादी जरूरतें मिलने लगें |


डॉ. जाकिर हुसैन

गांधीजी ने हमें आजादी किसलिए दिलाई थी ? इसलिए कि हमारे इरादे आजाद हों, हम जो बन सकते हैं, वह बनें | अच्छे आदमी बनें, अच्छा समाज बनाएं | अच्छे आदमी बनने और अच्छा समाज बनाने का जो रास्ता उन्होंने बताया है, वह मैं समझता हूं कि तीन लफ्जों में बयान हो सकता है – अहिंसा, विज्ञान और काम |

अहिंसा और विज्ञान ख्याली बात, किताबी चीज बन जा सकती है और बहुतों के लिए ऐसा है भी | गांधीजी की अहिंसा और गांधीजी का विज्ञान ख्याली और किताबी नहीं था | उन्होंने एक तीसरा रास्ता बताया | वह काम का रास्ता है | अहिंसा को भी जीवन में बरतना और विज्ञान को भी जीवन के लिए काम में लाना | उन्होंने अपने जीते-जी यह करके दिखलाया और आखिरी उम्र में बुनियादी शिक्षा की योजना में भी इसी ख्याल को पेश किया यानी आदमी का आदमी से  निबाह ! मिल-जुलकर काम करने की आदत और वह जिम्मेदारी, जिसमें समाज का हर काम, हर एक का अपना काम बन जाता है |

गांधीजी काम बता गए हैं, आगे चलने के रास्ते दिखा कर गए हैं, मगर काम खत्म करके नहीं गए | उस काम को करना हमारा फर्ज है | हमारे एक नादान भाई ने गांधीजी की जान को खत्म किया था | हम अपने खून के एक-एक कतरे में, अपनी बेगरज सेवा की मशक्कत के पसीने की हर बूंद में उनको जिंदा रखेंगे; अपनी मुहब्बतों में, अपनी मेहनतों में उन्हें जिंदा रखेंगे | अपने विचारों और अपने कामों में उन्हें जिंदा रखेंगे | हम अपनी जिंदगी को और अपने समाज की जिंदगी को ऐसा बनाएंगे और उसके अंदर गांधीजी के विचारों और उनकी राह को ऐसा रंगाएंगे कि हमारी जिंदगी और हमारे देश की जिंदगी खुद गांधीजी की जिंदगी बन जाए, इसका पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा उनके रंग में रंगा हुआ हो | यह देश गांधीजी के जीवन की तफ्सीर, टीका या भाष्य बन जाए, गांधी हमारा देश हो जाए |


हरिभाऊ उपाध्याय

सत्ताइस वर्षों तक उनके सान्निध्य का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ | सबसे पहले 1915 में लखनऊ कांग्रेस में मैंने उनके दर्शन किए और उसी ने मेरा ह्रदय खींच लिया | उनके आत्म-तेज और आत्म-विश्वास का सिक्का मेरे ह्रदय पर जम गया | इसके बाद वे चंपारण सत्याग्रह में भाग लेने के बाद, पंजाब मेल से दिल्ली होते हुए गुजरात जा रहे थे | रास्ते में कानपुर था | थर्ड क्लास के दरवाजे पर नंगे सिर, नंगे पैर वाली एक मूर्ति दिखाई दी | बदन पर मोटा कुर्ता, कमर पर मोटी, छोटी धोती | चेहरे पर द्दढ़ निश्चय और तपस्या का तेज ! जब बापू ने कहा कि या तो निलहे गोरों के अत्याचारों का अंत होगा या मेरी हडि्डयां चंपारण में गल जाएंगी, तो मेरी आंखों में आंसू भर आए | तीसरी बार इंदौर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में उनके दर्शन हुए | वे सम्मेलन में सभापति बन कर आए थे | अपनी समस्त व्यस्तताओं के बावजूद उन्हें किसी ने थकते नहीं देखा | सम्मेलन की विषय समिति में मैंने देखा कि उनकी ग्रहण शक्ति अदभूत है | उनकी जो पैनी दृष्टि मैंने देखी, उसी से मुझे उनके महापुरुष होने का निश्चय हो गया | सम्मेलन में उन्होंने जो उपसंहारात्मक भाषण दिया, उसने सबका मन हर लिया |

मैं इंदौर से ‘मालव मयूर’ नामक एक मासिक पत्र निकालना चाहता था, किंतु राज्य ने इसकी अनुमति न दी | तब खंडवा से एक साप्ताहिक पत्र निकालने का विचार मन आया और यह भी सोचा कि उसमें ‘यंग इंडिया’ से लेख और टिप्पणियां लेकर दी जाएं | इसी सिलसिले में मैं बापू के पास बंबई पहुंचा | उस समय वे गामदेवी के मणि भवन में ठहरे हुए थे | बापू से मिलने पर यह प्रस्ताव आया कि पत्र अहमदाबाद से निकालना चाहिए | मैंने इसे अपना सौभाग्य समझा | मैंने भगवान से प्रार्थना की कि मेरी सब कमजोरियां दूर करना और इस पवित्र आश्रम में रहने योग्य बनाना | मैं बंबई से सीधा अहमदाबाद चला आया | शुरु में कुछ समय शहर में रहना पड़ा, क्योंकि प्रेस और अखबारों के कार्यालय वहीँ थे | किंतु मन आश्रम की ओर दौड़ता था | आश्रम मेरे लिए उस माता के समान रहा जिसने न केवल नवजीवन दिया, बल्कि अपना अमृत-रस पान भी कराया | आश्रम न केवल भारत के लिए दुनिया भर के जिज्ञासुओं की प्रेरणा का केंद्र बना हुआ था |

हिंदी ‘नवजीवन’ के लिए बापू के ‘यंग इंडिया’ व गुजराती ‘नवजीवन’ के लेखों का जो अनुवाद करना पड़ता था, उससे सत्य, अहिंसा, खादी आदि के बारे में मुझे बहुत भोजन मिलने लगा | इसी समय मेरी बुद्धि ने अहिंसा धर्म सदा के लिए ग्रहण कर लिया | मैं अपने को अहिंसक सेवा का सिपाही मानने लगा | जिन दिनों ‘हिंदी नवजीवन’ निकला, इंग्लैंड के युवराज के बहिष्कार का आंदोलन चल रहा था | कानून तोड़ने की बारी आ गई थे | मैंने स्वयंसेवकों में अपना नाम लिखाना चाहा किंतु बापू ने कहा, तुम्हें ‘हिंदी नवजीवन’ का काम करते-करते पकड़े जाना है | सिपाही का काम अपनी ड्यूटी पर जमे रहना है | बापू का यह वचन मेरे ह्रदय पर अंकित हो गया | जब ‘हिंदी नवजीवन’ का पहला अंक निकला तो उसे लेकर मैं बापू के पास गया – “आपकी पसंद के माफिक निकला है या नहीं, यह जानने आया हूं |” बापू ने उत्तर दिया, “अच्छा, रख जाओ, देखकर बताऊंगा |” दूसरा अंक निकलने पर उसे लेकर मैं फिर गया, “यह दूसरा अंक निकल गया | पहला आपने देख लिया होगा | आप कुछ बताएं तो |” उन्होंने हंसकर कहा, “लेकिन मैं अभी तक पहला अंक भी नहीं देख पाया हूं | अब तो मुझे शायद ही समय मिले | लेकिन तुम अपना काम उत्साह से करते रहे | जब कोई बात सूझेगी तो बता दूंगा | तब तक तुम ऐसा समझो कि तुम्हारा काम मुझे पसंद है |” कुछ महीने बाद बापू गिरफ्तार होकर साबरमती जेल पहुंच गए | उनको छह वर्ष की लंबी कैद की सजा हो गई | इसके बाद ‘हिंदी नवजीवन’ के संपादक की जगह मेरा नाम जाने लगा |

1926 की बात है | बापू का एक पत्र मुझे मिला, जिसमें उन्होंने खादी केंद्र के एक कार्यकर्ता के बारे में शिकायतों की जांच का काम मुझे सौंपा | शिकायतें नैतिक स्वरूप की थीं | मामला कठिन था | मैं और देशपांडेजी दोनों खादी केंद्र पहुंचे | खादी कार्यकर्ता से मीठे ढंग से बातचीत की | उन्होंने सब बातें सच-सच बयान कर दीं | मैंने उन्हें समझाया कि खादी का काम कोरा व्यापारिक काम नहीं है | और यह काम बापू के पवित्र नाम पर चलता है तो हमें उसे उज्जवल रखना होगा | अत: आप इस केंद्र का चार्ज देशपांडेजी को सौंप दीजिए, और पहले आत्मशुद्धि का उपाय कीजिए | उन्होंने चार्ज दे दिया | केंद्र के बिगड़े वातावरण को ठीक करने में दो-तीन महीने लगे | मुझे एक-दो महीने लगातार वहां रहना पड़ा | गांववालों की भावनाओं को आघात पहुंचा था | खान-पान, आचार-विचार में कार्यकर्ता ने कोई मर्यादा नहीं रखी थी | गांववालों ने ऐलान कर दिया था कि कोई खादी वालों को कुएं पर पानी न भरने दे | हमने अपना दृष्टिकोण समझाया | गीता की कथा भी शुरु की | वातावरण अनुकूल हुआ | खादी आश्रम की ओर से हरिजनों की बस्ती में एक पाठशाला भी खोली गई | धीरे-धीरे सवर्णों के बालक भी आने लगे | अछूत सहायक मंडल कायम किया गया | राजस्थान में अस्पृश्यता मिटाने का यह पहला संगठित प्रयास था |

इधर इंदौर के मजदूरों ने हड़ताल कर दी – तमाम मिलों के कोई दस-बारह हजार मजदूर ! सवाल बोनस का था | बाद में मजदूरों के 13-14 घंटे काम के सवाल को भी जोड़ दिया | मजदूरों के प्रतिनिधि अहमदाबाद पहुंचे | मजदूर महाजन संध की अध्यक्षा श्रीमती अनुसूया बहन से मिले | उन्होंने और श्री शंकरलाल बैंकर ने बापू से परामर्श किया | मुझे लिखा कि मैं इंदौर जाकर मजदूरों की मदद करूं | साथ में बापू की हिदायत भी मिली कि मैं पहले राज्य के प्रधानमंत्री से मिलूंगा और फिर मजदूरों में काम शुरु करूंगा | इंदौर पहुंचा तो वातावरण उत्तेजनापूर्ण था | व्यापारी लूटपाट की आशंका से आतंकित थे, राज्य के अधिकारी परेशान | कुछ मजदूर मिल मालिक सर हुक्मचंद के घर गाली-गुफ्ता और उनके घर के कांच तोड़-फोड़ आए थे | मैं प्रधानमंत्री से मिला | मजदूरों को समझाया कि पहले शांति का वातावरण बनाना होगा | मजदूर नेताओं ने सर हुक्मचंद से क्षमा याचना की | इस सबका असर पड़ा | लूटपाट की आशंका नहीं रही | राज्य ने काम के दस घंटे निश्चित कर दिए | बोनस का प्रश्न भी हल हो गया | अब मालिकों ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया कि काम के घंटे कम हुए हैं तो मजदूरी भी घटाई जानी चाहिए | इस प्रश्न को पंच फैसले से निबटाने का प्रस्ताव मालिकों ने ठुकरा दिया | एक मित्र ने सुझाया कि अगर मिल मालिक सर हुक्मचंद को पंच बना दिया जाए तो यह मामला निबट सकता है | मैं बापू के पास गया | उन्हें भी यह सुझाव अटपटा लगा किंतु उन्होंने कहा कि अगर मजदूर इसके लिए राजी हों तो सोचा जा सकता है | श्री गुलजारीलाल नंदा भी मेरे साथ इंदौर आए | हम लोगों ने सर हुक्मचंद की मनोभूमिका जानने का प्रयत्न किया | उन्होंने हमें यकीन दिलाया कि वे मजदूरों के साथ न्याय करेंगे | हमने मजदूरों को राजी किया | दो महीने बाद फैसला आया कि मजदूरी में कोई कटौती न की जाय | मजदूरों की हड़ताल सफल रही | फिर सिद्ध हुआ कि बापू की रीति-नीति से मजदूर विजय प्राप्त कर सकते हैं |

बिजोलियां उदयपुर राज्य का एक ठिकाना था | 15 हजार की आबादी में 10 हजार से ऊपर किसान थे | ठिकाना किसानों से लगान के अलावा 80 तरह की लगानें वसूल करता था | किसान अरसे से अपनी तकलीफ मिटाने की कोशिश कर रहे थे | पथिकजी बिजोलियां पहुंचे | उन्होंने किसानों को संगठित किया | राजस्थान ही नहीं, शायद सारे भारत में किसानों को एक प्रकार संगठित करने का यह पहला प्रयास था | चार वर्ष तक किसानों ने लगान नहीं दिया | अंत में राजपूताना के ए.जी.जी. की मध्यस्थता से फरवरी 1922 में किसानों और ठिकाने में समझौता हुआ और बहुत-सी लाग-बेगार रद्द कर दी गई | नई बंदोबस्ती हुई | अब किसानों की शिकायत थी कि नए बंदोबस्त में बिना सिंचाई की जमीन पर लगान बढ़ा दिया गया है | किसानों की कुछ दूसरी शिकायतें भी थीं | जब उनकी सुनवाई नहीं हुई तो किसानों ने विरोधस्वरूप पथिकजी की सलाह पर माल जमीन का इस्तीफा दे दिया | माल जमीन कुल 80 हजार बीघा थी | उसमें से 60 हजार बीघा जमीन का इस्तीफा दिया गया | इस्तीफा देने वाले किसानों की संख्या 3895 थी | राज्य ने इस्तीफा मंजूर कर लिया और बहुत-सी जमीन दूसरों को पट्टे पर दे दी | किसानों में बड़ा असंतोष फैला |

राज्य के तत्कालीन रेवेन्यू मेंबर मि. ट्रैंच ने जमनालालजी से अनुरोध किया कि वे इस झगड़े को निबटा दें | किसानों ने भी उनसे सहायता मांगी | पथिकजी ने पंचायत के सलाहकार पद से इस्तीफा दे दिया | जमनालालजी ने मुझे अपना सलाहकार नियुक्त किया | मैंने समझौते के प्रयत्न शुरु किए | एक समझौता हुआ, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह तय हुआ कि इस्तीफाशुदा जो जमीन राज्य के कब्जे में है वह किसानों को तुरंत लौटा दी जाएगी और जो जमीन पट्टे पर दी जा चुकी है, उसे पट्टेदारों को खानगी तौर पर समझा-बुझाकर किसानों को दिलवा दी जाएगी | इस शर्त को पूरा करने की जिम्मेदारी मि. ट्रैंच ने ली थी | यह मामला लंबा चला किंतु किसानों को उनकी जमीन वापस नहीं मिली | निराश होकर उन्होंने 1931 में सत्याग्रह का आश्रय लिया और उस जमीन पर हल चला दिया, जो उनकी पुश्तैनी थी और जिसका पट्टा राज्य ने दूसरों को दे दिया था | राज्य की ओर से घोर दमन हुआ | माणिकलालजी सहित कई कार्यकर्ता और किसान जेलों में बंद किए गए | बुरी तरह मारा-पीटा और सताया गया |

मैं बापू के पास बारडोली पहुंचा | बापू ने सलाह दी कि फिलहाल सत्याग्रह स्थगित कर दिया जाए | वे मालवीयजी या जमनालालजी द्वारा समझौता कराने का प्रयत्न करेंगे | बिजोलियां का सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया | मालवीयजी के प्रयासों से एक समझौता हुआ | इस समझौते के अनुसार जिन किसानों को सत्याग्रह के सिलसिले में सजाएं हुई थीं, उन्हें रिहा कर दिया गया | यह भी तय पाया कि किसानों को उनकी जमीन लौटा दी जाएगी | लेकिन काफी समय तक किसानों को जमीन नहीं मिली | मैंने सोचा कि मुझे अनशन करना चाहिए | जमनालालजी ने यह सब बापू को बताया | बापू ने कहा कि अनशन करने का विचार हरिभाऊ के मन में आया यह तो मुझे अच्छा लगा परंतु उसे ऐसा करने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है | उसे पहले किसानों को संगठित करके, उनमें बल पैदा करना चाहिए | सत्याग्रही को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए | ऐसा ही हुआ | अंत में किसानों को उनकी जमीन वापस मिल गई | अहिंसा, धीरज, कष्ट सहन और त्याग द्वारा किसानों को उनका न्यायोचित हक प्राप्त हुआ |

बीकानेर के स्वर्गीय महाराजा सर गंगा सिंह के समय में श्री खूबरामजी सर्राफ और दूसरे कुछ व्यक्तियों पर षड्यंत्र और राजद्रोह का मुकदमा चल रहा था | मेरे एक मित्र ने एक बचाव कमिटी बनाई थी | मेरी भी उसमें दिलचस्पी थी | मुकदमे ने काफी हलचल मचा रखी थी | खुद पोलिटिकल एजेंट ने महाराजा को इस मामले को निबटा देने की सलाह दी थी किंतु महाराजा ने उनकी भी दाद नहीं दी | मित्र ने सुझाया कि इस मामले में बापू की मदद लेनी चाहिए | मैं उन्हें लेकर वर्धा गया | बापू ने तुरंत महाराजा को पत्र लिख दिया और हमें सचेत कर दिया कि यह समाचार अखबारों में न छपे | किंतु असावधानी से यह खबर अखबार में छप गई | मुझे बापू से माफी मांगनी पड़ी | बापू मुझ पर बहुत बिगड़े | उन्होंने इस भूल के लिए मुझे जिम्मेदार समझा | जब मैं दोबारा उनसे वर्धा में मिला तो उन्होंने बड़े दुखी स्वर में मुझसे कहा, “हरिभाऊ, तुम्हारे मित्र यह नहीं जानते कि उनका हित किसमें है ! इस खबर के जाहिर हो जाने से बीकानेर महाराजा अभियुक्तों को छोड़ते होंगे, तो भी नहीं छोड़ेंगे | तुमको पता है कि वह पोलिटिकल एजेंट को मना कर चुके हैं | अब जो आदमी पोलिटिकल एजेंट के कहने से अभियुक्तों को न छोड़े, वह गांधी के कहने से छोड़ दे, तो उसे तो गद्दी ही छोड़नी पड़े न ! पोलिटिकल एजेंट उसे खा जाएगा | अब इसका प्रायश्चित यही है कि आगे से तुम यह जानने की कोशिश न करो कि मैं इस विषय में क्या कर रहा हूं | तुमसे कहकर मैं दोबारा जोखिम नहीं उठाना चाहता |” मेरे लिए इससे बड़ा प्रायश्चित या दंड दूसरा नहीं हो सकता था |

जोधपुर के एक कार्यकर्ता थे सच्चे, नेक और व्रत, संयम और श्रद्धा रखने वाले | विवाहित थे | विवाह के दो-चार साल ही हुए होंगे कि उन्होंने ब्रह्मचर्य का नियम बना लिया | उन्हें अपनी पत्नी का सहयोग नहीं मिला | अब उनकी बड़ी बुरी दशा थी | जबरदस्ती के संयम से भीतर-ही-भीतर उनका मन कुंठित रहने लगा | वे बड़ी दुविधा में पड़े | तय पाया कि इस बारे में बापूजी का परामर्श लिया जाए | संयोग से बापू अजमेर स्टेशन से गुजरे | अजमेर से ब्यावर तक गाड़ी में मैंने उस दंपती को बापू से बातचीत का अवसर दिला दिया | मैं भी मौजूद था | बापू ने उस भाई से कहा, “तुम्हारा ब्रह्मचर्य मुझे कच्चा मालूम देता है | यही कारण है कि उसका असर तुम्हारी पत्नी के मन पर नहीं हो पाया है | सच्चे ब्रह्मचर्य का परिणाम ऐसा होना चाहिए कि जो उसके संपर्क में आए, उसका मन विकारों से फिर जाए | तुम्हारी पत्नी चौबीसों घंटे तुम्हारे साथ रहती है | फिर भी व्याकुलता से गृहस्थ जीवन चाहती है तो तुम्हें अपना आग्रह छोड़कर उसे संतोष देना चाहिए |” दोनों ने यह सलाह स्वीकार कर ली |

अजमेर के मेरे एक आर्यसमाजी मित्र बापू के बड़े आलोचक थे | स्पष्टवादी और मुंहफट भी थे | अक्सर कहा करते थे कि महात्माजी से मेरी भेंट करा दो तो मैं उन्हें खरी-खरी सुनाऊंगा | संयोग से बापू अजमेर से गुजरे और हम लोग उनके दर्शनार्थ गए | वे मित्र भी आ पहुंचे | मैंने बापू से उनका परिचय कराया और कहा कि ये आपसे कुछ कहना चाहते हैं | बापू राजी हो गए | मित्र ने अपनी बौछार शुरु कर दी | गांधीजी के रवाना होने-होने तक वे कहते ही रहे | ट्रेन निकल पड़ी | मैं बापू के साथ आगे तक चला गया | सोचा कि बापू को उनकी बातों का बुरा लगा होगा किंतु बापू ने मुझसे कहा, “मुझे अफसोस है कि ज्यादा वक्त नहीं था, नहीं तो मैं उनकी बातें और भी सुनता, उन्हें पूरा समय देता |” बापू में विरोधी के विचारों के प्रति बहुत धीरज था |

जयपुर का सत्याग्रह शुरु हुआ | नेता जमनालालजी और प्रजामंडल की कार्यकारिणी के सदस्य जेल जा चुके थे | कोई सौ स्वयंसेवक भी गिरफ्तार हो चुके थे | राजकोट में भी सत्याग्रह हुआ | बापू ने उसे स्थगित करा दिया | बापू राजकोट से दिल्ली आ रहे थे | हमें रास्ते में उनसे मिलकर जयपुर सत्याग्रह का हाल बताना था | हमने सुना था कि बापू ने राजकोट का सत्याग्रह इसलिए बंद करा दिया कि उसमें सत्याग्रह के नियमों का ठीक-ठीक पालन नहीं हो रहा था | हमें डर लगा कि कहीं बापू जयपुर का सत्याग्रह भी स्थगित न करा दें | बापू ने पूछा, “तुम्हारा सत्याग्रह तो ठीक-ठीक चल रहा है न ? कोई गड़बड़ तो नहीं है ?” मैंने कहा, “बापूजी, कह तो नहीं सकते कि सब ठीकठाक चल रहा है | गलतियां भी हो रही हैं पर हम लोग पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं कि गलतियां रुकें और आगे न होने पाएं |” बापू गंभीर हो गए और राजकोट सत्याग्रह की एक त्रुटि बताने लगे ताकि हम अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह समझ लें | दिल्ली जाकर सलाह दी कि जयपुर सत्याग्रह स्थगित कर दिया जाए | हमने आशंका प्रकट की कि इससे लोग निरुत्साहित हो जाएंगे | बापू ने कहा, “जयपुर का मामला हल करने के लिए यदि अकेले जमनालालजी भी जेल में पड़े रहे तो काफी होगा | उनकी कुर्बानी भी यह सरकार पचा न सकेगी |” फिर उन्होंने बताया कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे इस मामले को निबटा देंगे | अत: उन्हें ऐसा करने के लिए कुछ समय देना चाहिए |

1934-35 में बापू हरिजन यात्रा के सिलसिले में अजमेर और ब्यावर भी आए | एक मित्र ने प्रस्ताव रखा कि अजमेर में बापू अर्जुनलालजी सेठी के घर जाएं | सेठीजी अपने ढंग के स्वतंत्र व्यक्ति थे | बापू के आलोचक थे | कानपुर कांग्रेस के समय बापू को काफी खरी-खोटी सुनाई थी | बापू ने मेरी राय पूछी – सेठीजी के यहां जाना चाहिए? मैंने कहा, जाने में हर्ज नहीं, किंतु सेठीजी की वृत्ति में उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा | बापू ने पूछा, तुम साथ चलोगे ? सेठीजी उस समय मुझसे खास ही नाराज थे, सो मैंने अनिच्छा प्रकट की | बापू ने कहा, सेठीजी के यहां जाना चाहिए | तुम कहते हो वैसा ही नतीजा निकले तो भी हमें शुभ कार्य करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए | बापू सेठीजी के यहां गए तो सेठीजी गद्गद हो उठे | हम लोग भी आनंद विभोर हो  उठे |

इस यात्रा में बापू को अजमेर के एक पुराने मेजबान ने अपने यहां शाम के भोजन का निमंत्रण दिया | कुछ लोग बापू को उनके यहां जाने देना नहीं चाहते थे | बापू को मैंने बताया कि इस मित्र के बारे में कुछ शिकायतें सुनी हैं और लोग आपके उनके यहां जाने का विरोध करते हैं | बापू ने उस मित्र से मेरा आमना-सामना करा दिया | मैंने उन मित्र से इन शिकायतों के बारे में पहले बातचीत नहीं की थी | इससे मैं बड़ी दुविधा में पड़ गया | उन मित्र से चर्चा की और उसकी जो रिपोर्ट बापू को सुनाई, उस पर बापू ने उस समय उनके खिलाफ फैसला नहीं दिया | उन्होंने कहा, जब तक किसी के खिलाफ शिकायतें सच साबित नहीं हो जातीं, तब तक उसे निर्दोष मानना चाहिए | अत: मुझे उनके यहां जाना चाहिए | बापू उन मित्र के यहां गए | मुझे एक अच्छा सबक मिला |

1928-29 में हमने कोंग्रेस का चुनाव लड़ा | मतदाताओं के लिए खादी पहनने की शर्त थी | दोनों दलों ने मिलकर 14 हजार सदस्य बनाए | प्रतिपक्षियों ने थोड़े से खादी के कपड़े बनवा लिये और बारी-बारी से उन्हीं को पहनाकर लोगों से वोट दिलवाए | इस आधार पर चुनाव रद्द कर दिया गया | मैंने बापू को इसकी सूचना दी | उन्होंने फौरन मुझसे पूछा, तुम्हारे पक्ष वालों ने तो कोई गलती नहीं की? मेरे साथी घबराए, क्योंकि ऐसी खबर लगी कि बावजूद हमारी कोशिश के लोगों ने अनियमितता की थी | अनियमितता तत्कालीन कोंग्रेस के विधान या परिपाटी के अनुसार तो नहीं पर बापू के मापदंड से अनुचित हो सकती थी | मैंने बापू को लिखा कि आपके स्टैंडर्ड से हम लोग भी अवश्य कुछ दोषी हैं, कोंग्रेस के स्टैंडर्ड से नहीं गिरे हैं | हमारा सच्चे दिल से यही प्रयत्न है कि आपकी परीक्षा में पास हों | बापू ने हमारी कठिनाई और परेशानी को समझ लिया | लिखा: “चिंता करने की जरूरत नहीं, सच्चे दिल से शुद्धि का प्रयत्न करते रहो |”

अजमेर में हमने खादी और ग्रामोद्योग प्रदर्शनी की और किले की बुर्ज पर ऊंचा राष्ट्रीय झंडा फहराया | तत्कालीन कमिश्नर ने आदेश भेजा कि झंडा उतार लिया जाए | उन दिनों सत्याग्रह आंदोलन स्थगित था | बापू का सख्त आदेश था कि उनकी इजाजत के बिना कोई कानून न तोड़ो | हम धर्मसंकट में पड़े | दो घंटे में बापू की इजाजत प्राप्त नहीं की जा सकती थी और इधर अपमानजनक हुक्म को मानने को कोई तैयार नहीं था | हमने निर्णय किया कि झंडा न उतारा जाए | आदेश की अवहेलना के जुर्म में प्रदर्शनी के मंत्रियों को चार-चार महीने की कड़ी कैद की सजा दी गई | जब मामला बापू के सामने गया तो उन्होंने कहा, तुम लोगों ने अनुशासन तो भंग किया है किंतु तुम्हारी परिस्थिति मैंने समझ ली है | गलती हुई है लेकिन सही दिशा में |” बापू ने ‘हरिजन’ में हमारे पक्ष का ही समर्थन किया |

सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८