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दक्षिण अफ्रीका : सत्याग्रह का प्रवेश-द्वार
गांधीजी

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन का संपूर्ण इतिहास ही गांधीजी ने लिखा है | लेकिन 1916 में एक प्रसंगवश कोचरब आश्रम में उन्होंने सत्याग्रह के उस आंदोलन की याद करते हुए सत्याग्रह के तत्त्वों का बेहद सरलता से वर्णन किया | सत्याग्रह के प्रवेश-द्वार पर खड़े मोहनदास करमचंद गांधी की मनोभूमिका बताती है कि सत्य जितना अधिक होगा, आग्रह की जरूरत उतनी कम होती जाती है |

सत्याग्रह का रहस्य ‘जीवन के तत्त्व की खोज करना’ हो सकता है | हम इसी खोज के लिए लड़ रहे हैं | यदि हम ऐसा कहते तो वहां वाले हमारी खिल्ली उड़ाते | हमने आंदोलन का गौण हेतु ही प्रकट किया कि वहां की सरकार हमको नीचे दर्जे का और हीन मान कर देश से निकालने के लिए नये-नये कायदे-कानून गढ़ रही है | उन कानूनों को अंगीकार न करके अपना शौर्य प्रकट करना उचित है | मान लीजिए कि सरकार ने इस आशय का कानून बना दिया कि काले आदमी पीली टोपी पहना करें | एक बार रोम में यहूदियों के लिए ऐसा ही कानून बनाया गया था | यदि सरकार ऐसा ही व्यवहार करने लगे और हमारे लिए कोई ऐसा कानून बनाने लगे जिसका हेतु हमारा अपमान करना जान पड़े, तो हमें सरकार को स्पष्ट रूप से जता देना चाहिए कि हम इस कानून को नहीं मानेंगे | एक बालक बाप से कहता है कि तुम हमें उलटी पगड़ी पहनकर दिखाओ तो बाप समझता है कि लड़का हमें इस प्रकार देखकर हंसना चाहता है | वह सहर्ष उसके हुक्म की तामील कर देता है पर और कोई आदमी बदनीयती से वही बात कहता है तब वह साफ जवाब देता है, “भाई, जब तक हमारे धड़ पर सिर है तब तक तुम हमारा यह अपमान नहीं कर सकते | इसलिए पहले तुम हमारा सिर उतार लो, फिर जिस तरह चाहते हो उसे उलटी-सीधी पगड़ी पहनाओ |”

इसी तरह वहां की सरकार हिंदुस्तानियों को नीचे समझ कर, उनके साथ गुलामों का-सा बरताव करती तथा जहां तक हो सके उन्हें अपने देश में आने से रोकना चाहती थी | वह नये-नये कायदे-कानून गढ़ने लगी, जैसे हिंदुस्तानियों के नाम अलग रजिस्टर में दर्ज करना, चोरों और डकैतों की तरह उनकी अंगुलियों के निशान लेना, उन्हें राज्य के किसी एक विशेष क्षेत्र में ही बसने पर विवश करना, निश्चित सीमा से उनके बाहर निकलने का निषेध करना, उनके लिए खास रास्तों से चलने और रेल के खास डिब्बों में सवार होने का नियम बनाना, विवाह का प्रमाणपत्र न होने पर उनकी स्त्रियों को रखैल मान लेना, प्रति व्यक्ति से हर साल 45 रूपये का कर वसूल करना आदि-आदि | मूल रोग एक होने पर भी वह बहुधा शरीर में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुआ करता है | इसी तरह मुख्य रोग, जैसा कि पहले कह चुके हैं, दक्षिण अफ्रीका की सरकार की बुरी नीयत थी और उल्लिखित सब कायदे-कानून उनके भिन्न-भिन्न स्वरूप थे | इसलिए इन सभी कानूनों के खिलाफ लड़ने के लिए हमें तैयार होना पड़ा |

अन्याय के प्रतिकार के दो प्रकार हैं | एक है अन्याय करने वाले का सिर तोड़ना और ऐसा करते हुए अपना भी सिर तुड़वाना | संसार में सभी शक्तिमान लोग इसी मार्ग का अवलंबन करते हैं | प्रत्येक स्थान पर युद्ध होता है, लाखों-करोड़ों मनुष्य मारे जाते हैं | परिणामस्वरूप राष्ट्र की उन्नति तो नहीं होती, पर हां अवनति अवश्य होती है | युद्ध-क्षेत्र से जीत कर लौटे हुए सैनिक विवेकशून्य हो जाते हैं और उनकी बदौलत समाज में अनेक उपद्रव होने लगते हैं | इसके उदाहरण के लिए दूर नहीं जाना होगा | बोअर युद्ध में जिस समय ब्रिटिश सरकार मेफेकिंग में विजयी हुई उस समय समस्त इंग्लैंड, विशेषकर लंदन नगर यहां तक हर्षोन्मत्त हो गया कि छोटे-बड़े सभी पुरुष रात-दिन नाचते ही रहे | उन्होंने भरपेट शरारतें कीं, भरपेट उछल-कूद की और दुकानों में शराब की एक बूंद भी बाकी न रहने दी | इन कई दिनों का वर्णन करते हुए ‘टाइम्स’ ने लिखा कि ये दिन लोगों ने जिस रीति से बिताए उसका वर्णन शब्दों द्वारा नहीं हो सकता, केवल इतना ही कहा जा सकता है कि ‘द इंग्लिश नेशन वेंट अ-मेफेकिंग’ – अंग्रेज जाति को मेफेकिंग-उन्माद हो गया | विजयी राष्ट्र घमंड के कारण बदमिजाज हो जाता है, ऐश-आराम का आदी हो जाता है; और कुछ काल तक देश में शांति दीख पड़ती है सही; परंतु कुछ ही दिनों बाद मालूम होने लगता है कि युद्ध का अंकुर नष्ट नहीं हुआ, बल्कि सहस्त्रों गुना अधिक पुष्ट और बलवान हो गया है | युद्ध द्वारा विजय प्राप्त करके कोई देश न कभी सुखी हुआ है और न होगा | ऐसा देश उन्नत नहीं होता, बल्कि और गिरता है | वास्तव में उस राष्ट्र की जीत नहीं, हार होती है | और फिर यदि हमारा कार्य या उद्देश्य भ्रमपूर्ण हुआ तो ऐसे युद्ध से दोनों पक्षों की भयंकर हानि होती है |

परंतु अन्याय के विरुद्ध लड़ने की जो दूसरी रीति है उसमें अपनी गलती का नुकसान हमें खुद ही उठाना पड़ता है, दूसरा पक्ष उससे बिलकुल बचा रहता है | यह दूसरी रीति ‘सत्याग्रह’ है | इस उपाय का अवलंबन करने वाले को दूसरे का सिर नहीं तोड़ना पड़ता, केवल अपना ही सिर तुड़वाना पड़ता है, सब यातनाएं सहते हुए मरने के लिए तैयार रहना पड़ता है | दक्षिण अफ्रीका की सरकार के अत्याचारी कानूनों का मुकाबला करने में हमने इसी उपाय का अवलंबन किया था | हमने सरकार को कहला भेजा कि “हम तुम्हारे अत्याचारी नियमों के सामने कभी सिर न झुकाएंगे | जिस तरह दो हाथों के बिना ताली नहीं बजती, दो आदमियों के बिना झगड़ा नहीं होता, उसी तरह दो पक्षों के बिना राज्य का अस्तित्व भी नहीं रहता | जब तक हम अपने-आपको तुम्हारी प्रजा मानते हैं तभी तक तुम हमारे राजा-हमारी सरकार-हो | हम प्रजा नहीं तो तुम राजा भी नहीं ! जब तक तुम्हारी चेष्टा हमें न्याय और प्रेम से बांधने की रहेगी तभी तक हम ऐसा होने देंगे | यदि तुम छल से हमारा घात करना चाहो तो वह असंभव है | दूसरे मामलों में तुम जो चाहे सो करो, पर हमारे लिए बनाए गए कानूनों में तुमको हमारा मत लेना ही पड़ेगा, हमारी सलाह के बिना तुम हमें अनुचित रीति से दबा रखने के लिए जो कानून बनाओगे वे तुम्हारी पुस्तकों में ही रह जाएंगे | हम कदापि उनका पालन न करेंगे | इसके लिए हमें तुम जो चाहो सो सजा दो | जेल भेज दो तो उस स्वर्ग मान कर हम उसमें रहेंगे | फांसी पर चढ़ने के लिए कहो तो हंसते हुए चढ़ जाएंगे | हम पर दुखों की जितनी वर्षा करो, सबको शांतिपूर्वक सहन करेंगे, पर तुम्हारे एक रोएं को भी कष्ट न पहुंचाएंगे | हम आनंदपूर्वक मर जाएंगे, तुमको स्पर्श तक न करेंगे पर इन हडिडयों में जान रहने तक हमसे तुम्हारे मनमाने कानूनों का पालन करवाना असंभव है |”

आरंभ यों हुआ कि एक रविवार की संध्या को जोहानिसबर्ग में एक पहाड़ी पर मैं और हेमचंद्र नाम एक और सज्जन बैठे थे | उस दिन की याद मुझे इतनी ताजा है कि मानो कल की बात हो | मेरे पास सरकारी ‘गजट’ रखा हुआ था | उसमें भारतवासियों से संबंध रखने वाले कई कानूनों के पास होने की बात लिखी थी | उसे पढ़ते ही मेरा सारा शरीर गुस्से से कांप उठा | मैंने मन में कहा – हें, सरकार ने हम लोगों को क्या समझ रखा है ! मैंने उसी दम ‘गजट’ के उस अंश का, जिसमें उक्त कानूनों का उल्लेख था, अनुवाद कर डाला और उसके नीचे लिखा कि “मैं कभी इन कानूनों की सत्ता अपने ऊपर न चलने दूंगा |” यह लेख तत्क्षण फीनिक्स के ‘इंडियन ओपीनियन’ में छपने के लिए भेजा गया |

मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि इस काम में कोई भारतवासी अपूर्व वीरता प्रकट करेगा अथवा सत्याग्रह का आंदोलन इतना जोर पकड़ेगा | मैंने यह बात उसी क्षण हिंदुस्तानी भाइयों से कही और बहुतेरे सत्याग्रह करने को तैयार हो गए | पहले युद्ध में लोग यह समझकर सम्मिलित हुए कि थोड़े ही दिनों तक कष्ट सहने से हमारा उद्देश्य सिद्ध हो जाएगा | दूसरे युद्ध के समय आरंभ में थोड़े ही लोग सम्मिलित हुए, पीछे बहुत-से लोग आ मिले | बाद में श्री गोखले के वहां पहुंचने पर दक्षिण अफ्रीका की सरकार से समझौते का वचन पाकर यह लड़ाई बंद की गई | परंतु सरकार ने फिर दगाबाजी की और अपना वचन पूरा करने से इनकार कर दिया | इस पर तीसरा सत्याग्रह युद्ध आरंभ करना पड़ा | उस समय गोखले ने मुझसे पूछा था कि आंदोलन में कितने आदमी सम्मिलित होंगे ? मैंने लिखा कि 30 से 60 आदमी तक सम्मिलित होंगे | परंतु मुझे इतने साथी भी न मिले | हम 16 आदमियों ने ही मुकाबला शुरु किया | हमने द्दढ़ निश्चय कर लिया था कि जब तक सरकार अपने अत्याचारी कानूनों को रद्द न करेगी अथवा कोई और समाधानकारक समझौता न करेगी, तब तक हम हर एक दंड भुगतेंगे पर सिर न झुकाएंगे | हमें इस बात की बिलकुल आशा न थी कि हमें बहुत-से साथी मिलेंगे पर एक मनुष्य के भी नि:स्वार्थपूर्वक सत्य और देशहित के लिए आत्म-समर्पण करने के लिए तैयार होने का परिणाम अवश्य ही होता है | देखते-ही-देखते बीस हजार मनुष्य आंदोलन में सम्मिलित हो गए | जेलों में जगह न रही और समस्त भारत का खून खौलने लगा |

बहुत से लोग कहते हैं कि यदि लॉर्ड हार्डिंग बीच-बचाव न करते तो समझौता होना असंभव था | पर ये लोग यह भूल जाते हैं कि लॉर्ड साहब ने आखिर मध्यस्थता क्यों की ? दक्षिण अफ्रीका की अपेक्षा कनाडा के हिंदुस्तानी कहीं अधिक दुख पा रहे थे | उन्होंने वहां मध्यस्थता क्यों नहीं की ? जिस स्थान पर हजारों स्त्री-पुरुषों का आत्मबल एकत्र हो, जिस स्थान पर असंख्य नर-नारी प्राण हथेली पर लिये हुए हों, वहां कौन-सी बात असंभव है ? मध्यस्थता करने के सिवा लॉर्ड हार्डिंग के लिए कोई उपाय ही न था और ऐसा करके उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता प्रकट की |

इसके बाद जो कुछ हुआ उसे आप जानते ही हैं, अर्थात् दक्षिण अफ्रीका की सरकार को मजबूर होकर हमारे साथ समझौता करना पड़ा | इन बातों से सिद्ध हुआ कि हम हर एक चीज को बिना किसी को चोट पहुंचाए केवल आत्मबल से – सत्याग्रह से – प्राप्त कर सकते हैं | शस्त्र से युद्ध करने वाले को शस्त्र तथा दूसरों की सहायता का अवलंबन लेना पड़ता है | सीधे-सादे रास्ते को छोड़कर टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियां ढूंढ़नी पड़ती है | सत्याग्रही जिस मार्ग से युद्ध करता है वह सरल होता है, उसे किसी की प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ती | वह अकेला भी लड़ सकता है | हां, उस दशा में फल अवश्य कुछ देर से मिलेगा | अफ्रीका के आंदोलन में यदि मुझे बहुत-से साथी न मिलते तो उसका नतीजा इतना ही होता कि आज आप लोग मुझे अपने बीच में बैठा हुआ न देख पाते | शायद मेरी सारी आयु वहां लड़ने ही में खर्च हो जाती | पर इससे क्या होता ? जो फल मिला वह कुछ देर से मिलता | सत्याग्रह के युद्ध में केवल अपनी ही तैयारी की जरूरत पड़ती है | हमें पूर्ण संयमशील होना चाहिए | इस तैयारी के लिए यदि गिरि-गुफाओं में रहने की आवश्यकता हो तो वहां भी जाकर रहना चाहिए |

इस तैयारी में जो समय लगेगा उसे समय की व्यर्थ बरबादी नहीं समझना चाहिए | ईसा ने जगत का उद्धार करने के लिए निकलने से पूर्व चालीस दिन जंगल में रहकर अपनी तैयारी की थी और बुद्ध ने भी वैसी ही तैयारी करने में बरसों लगाए थे | यदि उन्होंने इस प्रकार तैयारी न की होती तो वे कदाचित ईसा और बुद्ध न हुए होते | वैसे ही यदि हम अपने शरीर को सत्य के पालन और परोपकार के निमित्त अनुकूल बनाना चाहते हों तो हमें पहले ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य आदि गुणों को विकसित करके अपनी आत्मिक उन्नति करनी चाहिए | उसके बाद ही यह कहा जा सकता है कि हम सच्ची देश-सेवा करने के योग्य हो गए |

सत्याग्रह के संघर्ष का हेतु लोगों में से कायरता निकालकर पौरुष भरना और सच्चे मनुष्यत्व को विकसित करना था, और वहां की सरकार से संघर्ष उसका कार्यक्षेत्र था |

सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८