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कानून से अहिंसा नहीं आती
विनोबा

[ विनोबा का पूरा जीवन अहिंसा के प्रयोग में ही बिता | भूदान सम्भवत: पिछली शताब्दी के महानतम अहिंसक आन्दोलनों में से एक था | ]

हिंसा जनता की शक्ति नहीं, विशिष्ट वर्ग की ही शक्ति हो सकती है | फिर चाहे आप जनता के लिए कह कर वह शक्ति इस्तेमाल करने का दावा करें | परन्तु वह कभी जनशक्ति नहीं हो सकती | अहिंसा ही जनशक्ति हो सकती है | आज सामान्य स्थिति यह है कि लोग सत्य को मानते हैं, लेकिन अधिकांश की सत्य पर, निष्ठा नहीं है | अहिंसा को मानते हैं, लेकिन अहिंसा पर निष्ठा नहीं है | ईश्वर को मानते हैं, लेकिन ईश्वर पर निष्ठा नहीं है | भारत अहिंसा मानता है, लेकिन उसकी निष्ठा अहिंसा पर है या हिंसा पर ? निष्ठा है हिंसा की और श्रद्धा है अहिंसा की, तो अहिंसा की बात तभी तक काम में आयेगी, जब तक विशेष कठिन प्रसंग नहीं आता |
आज तो शस्त्रास्त्र बढ़ाने की कोशिश हो रही है क्या उसका विरोध करने से अहिंसा चलेगी ? अगर उसका विरोध करेंगे तो लोगों के मन में भय पैदा होगा | अहिंसा के प्रति निष्ठा नहीं पैदा होगी | ऐसी हालत में हम केवल विरोध करेंगे तो देश ऊपर नहीं उठेगा | उधर शस्त्रास्त्रों की तैयारी भले चले, लेकिन इधर हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि जिससे हम नागरिकों में अहिंसा की निष्ठा पैदा कर सकें |
जब तलवार से लोग लड़ते थे तो हिंसा कम होती थी | लेकिन जो होती थी वह क्षोभ के साथ होती थी | उसमें क्रोध होता था | एक-दूसरे का गला काटने में क्रोध होता है | आज एटम बम से लड़ाई होती है तो क्रोध का सवाल नहीं, आवेश का सवाल नहीं, मनुष्य को देखते ही नहीं, कहीं कोई किसी का चेहरा देखते नहीं, जानते नहीं, सिर्फ दूर से बम डालते हैं | ‘बेलेस्टिक वेपन’ भी दूर से भेजते हैं | उसमें संहार बहुत ज्यादा होता है, लेकिन फिर भी उसमें क्रोध नहीं होता |
उसमें द्वेष और मूर्खता होती है | विज्ञान के जमाने में गणित करना पड़ता है | गणित के साथ आगे बढ़ो, गणित के साथ पीछे हटो | डर से पीछे नहीं हट सकते, गुस्से से आगे बढ़ नहीं सकते | सब हलचलें नियंत्रित होती हैं | इसका मतलब सेनामें भी अहिंसा दाखिल हो चुकी है | यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि एटम के युग में जो शस्त्रों का उपयोग हुआ, उसमें संहार तो बहुत हुआ, लेकिन फिर भी वह अहिंसा के नजदीक है |
गांधीजी ने कहा था कि ‘आर्गेनाइजेशन इज दी टेस्ट ऑफ नान वायलेन्स’ यानी अहिंसा कभी संगठन नहीं करेगी | लेकिन फिर भी अहिंसा में अच्छा से अच्छा आर्गेनाईजेशन होगा | हिंसा में आर्गेनाइजेशन किया जाता है, अहिंसा में वह किया नहीं जाता | तो भी अधिक से अधिक आर्गेनाइजेशन होता है | तभी अहिंसा टिकती है | यह अहिंसा का टेस्ट (कसौटी) है | अहिंसा में किसी प्रकार का आदेश नहीं दिया जाता और फिर भी काम इतना अच्छा करता है कि आज्ञांकित सेना भी वैसा काम नहीं कर सकती | हमारी संस्थाओं को ऐसी हिम्मत करनी होगी कि व्यक्ति के न मिलने के कारण काम बन्द है और इसलिए संस्था डूब गयी, यह कहने की हालत न आने दें |
अहिंसा एक क्रांतिकारी वस्तु है | यह विचार तो पुराना है, लेकिन सामूहिक तौर पर सामाजिक क्षेत्र में उसका प्रयोग करने की कोशिश पहले नहीं हुई | गांधीजी ने उसका एक प्रयोग हिन्दुस्तान में राजनीतिक क्षेत्र में किया | अब वह चीज कुल दुनिया ने सामूहिक काम के लिए मान्य की है | इसका मतलब यह नहीं है की दुनिया में हिंसा कम हुई है | फिर भी दुनिया ने अहिंसाको सामाजिक क्षेत्र में एक कारगर उपाय के रूप में मान्यता दी है | सामाजिक समस्याओं का परिहार अहिंसा के जरिये करना चाहिए, किया जा सकता है, उसके प्रयोग करने चाहिए, ऐसा विचार दुनिया ने मान्य किया है |
भूदान का काम तो एक प्रयोग है, जिसके जरिये हमें अहिंसा की शक्ति को विकसित करना है | हमें किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए, सबका सहयोग हासिल करना चाहिए और खुद सातत्य से काम में लगे रहना चाहिए | तितिश्रासम्पन्न और प्रेम से काम करने वाले कार्यकर्ता जितने मिलेंगे, उतना यह काम आगे बढ़ेगा | यह काम किसी भी राजशक्ति से नहीं हो सकता, यह राजशक्ति से परे है | यह एक धर्मचक्र-प्रवर्तन का कार्य है |
एक सफेद खादी पहना हुआ मनुष्य है और उसके कपड़े पर थोड़ा सा दाग लग गया स्याही का या और किसी चीज का, तो उधर एकदम ध्यान जाता है और अगर वस्त्र काला ही वस्त्र हो और दो-चार दाग पड़ जाये तो भी दीखता नहीं | सफेद पर दाग बहुत जल्दी दिखाई पड़ता है | मानव स्वभाव में अहिंसा भरी है | इसलिए जरा भी विरोधी चीज होगी तो मनुष्य को एकदम मालूम होगा | थोड़ी होगी तो भी ज्यादा मालूम होगी |
अहिंसा की शक्ति संख्या पर निर्भर नहीं है, अंत:शुद्धि पर निर्भर है | जैसे एटम बम की इम्पर्सनल ताकत बनी, उसी तरह से अहिंसा में भी इम्पर्सनल फैक्टर दाखिल करना होगा | तभी अहिंसा शक्ति जाग्रत होगी | जैसे घर बैठे-बैठे सारी दुनिया को खत्म करने की ताकत मनुष्य के हाथ में आई है, वैसे ही घर बैठे-बैठे सारी दुनिया को बचाने की ताकत मनुष्य के हाथ में आ सकती है | वह जो अहिंसा की ताकत होगी, वह अव्यक्त शक्ति है | उसकी खोज करनी चाहिए | वह तब तक नहीं होगी, जब तक हम मन से परे होकर चिंतन नहीं कर सकते |
अहिंसा का विकास करना हो और अहिंसा की शक्ति प्रकट होनी है, तो संस्था, सम्प्रदाय या पक्ष जैसा किसी भी तरह का परदा मनुष्य-मनुष्य के बीच नहीं रहना चाहिए | सम्प्रदाय के बन्धन से जब लोग एकत्र होते हैं तब उसकी कल्याण करने की शक्ति नहीं बढ़ती | जब वे सहज बंधुभाव से एकत्र होते हैं, स्थूल सम्बन्ध को गौण समझते हैं, मत की अपेक्षा मनुष्य को अधिक महत्व देते हैं, बाह्य कर्म की अपेक्षा आंतरवृत्ति को महत्व देते हैं, मनुष्य को मनुष्य की तरह पहचानते हैं, तब कल्याण करने की शक्ति बढ़ती है |
कानून का आधार भी हिंसा पर है | कानून का लोग अमल करें, ऐसा कानून चाहता है | नहीं करेंगे तो ‘मिलीटरी’ आयेगी | इसलिए कानून के द्वारा अहिंसा कभी लायी नहीं जा सकती, क्योंकि उसका आधार मिलीटरी है | अगर अहिंसा लानी हो तो जनशक्ति के द्वारा ही लायी जा सकती है | कानून मिनिमम होता है, कम से कम चीज कानून करता है | ‘मिनिमम मॉरल’ – चोरी नहीं करना, किसी का खून नहीं करना, उसका नाम है कानून | अहिंसा लाना कानून का कार्य नहीं है | यह आपका, हमारा, सबका काम है |

सौजन्य : सर्वोदय जगत, सितंबर २०११