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गांधी का रास्ता ही हमारा रास्ता है
जयप्रकाश नारायण

वादों-विवादों से कहीं दूर, सत्ता की छीना-झपटी का ऐसा कोहराम आज मचा हुआ है कि स्थिर व संयमित चिंतन की गुंजाइश ही खत्म होती जा रही है | बंद दिमाग या लकीर की फकीर बौद्धिकता न आंख बन सकती है, न रास्ता दिखा सकती है | जरूरत है कि भारतीय बौद्धिक जगत को गांधी से दिशा मिले ताकि वह राष्ट्र-निर्माण में कोई सार्थक भूमिका निभा सके |

आजादी के बाद गांधी से अलग और दूर जाकर जिस आर्थिक व राजनीतिक मॉडल पर देश का विकास करने की कोशिश हुई उसकी विफलता से गहरी निराशा व दिशाहीनता फैली है | यह भारतीय बौद्धिकों के उस वर्ग में ज्यादा गहरी उतरी है जिसने जवाहरलाल नेहरु के उदारवादी मॉडल के दौर में अपनी आंखें खोलीं और जिन पर मार्क्सवादी दर्शन व आंदोलन का गहरा असर रहा | फिर इनमें से कुछ ने यह खोजने की कोशिश की कि क्या कोई ज्यादा भारतीय स्वरूप का ऐसा मॉडल है जो आधुनिक विश्व की चुनौतियों का मुकाबला भी कर सके और भारतीय परंपरा के सर्वोत्तम तत्वों का निर्वहन भी करता हो ? वे खुद से पूछते रहे कि ऐसा कुछ कहीं है क्या ? एक ऐसा मॉडल, जो जनता को व्यापक तौर पर राजनीतिक व आर्थिक विकास की प्रक्रिया में भागीदार बना सके ? कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे खोजियों में से कुछ उस गांधी से टकराए, जिसके विचार और तौर-तरीके पिछले कोई तीन दशकों तक उन्हें आकर्षित भी नहीं करते थे | देश के बौद्धिक समाज में यह शुभ परिवर्तन हुआ है |

लेकिन साथ-ही-साथ यह भी हुआ कि गांधी को यहां-वहां किसी उलझन के संदर्भ में या फिर सतही तौर पर देखा या स्वीकारा जाने लगा है | लेकिन गांधी तो ऐसे बहुआयामी व्यक्ति थे जिन्हें गहराई से समझना हो तो मनुष्य-जीवन को कृत्रिम खानों में बांट कर, टुकडों में अध्ययन करने वाली पद्धति काम नहीं आती है | गांधी को समझने की कोई भी ईमानदार कोशिश तभी सफल हो सकती है जब आप मनुष्य के और समाज के सभी आयामों को जोड़ कर देखने का बौद्धिक विज्ञान समझते भी हों और अपनाते भी हों |

पंडित नेहरु ने कुछ उदारवादी और कुछ मार्क्सवादी मॉडल की जो खिचड़ी देश के सामने रखी थी उसने कुछ नया हो सकने की संभावना दिखाई थी | शुरु के दौर में ऐसा भी लगा कि इसका परिणाम आ रहा है | लेकिन ठीक इसी वक्त, जब कई लोग उसकी सफलता का गुणगान कर रहे थे, मैंने उसके विनाश का मूल पहचान लिया था और मैंने खुद को उनसे अलग कर लिया था | नेहरु-मॉडल की शुरूआती सफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि गुलामी के लंबे दौर में रुद्ध पड़ी आर्थिक गतिविधि में आजादी के बाद थोड़ी हलचल हुई, सार्वजनिक क्षेत्र का नया दरवाजा खुला और सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं में धन उड़ेला | इससे विकास की गति बढ़नी ही थी | लेकिन जो पहचानने में हमारी बौद्धिक जमात चुक गई वह यह था कि यह मॉडल अपने-आप में अधिकांशत: अ-भारतीय था और मुट्ठी भर लोगों या वर्गों के बीच सिकुड़ा हुआ था | इसलिए इसकी विफलता निश्चित थी | यह कोई संयोग नहीं था कि इस मॉडल ने समाज में भयंकर गैर-बराबरी पैदा की, आय व संपत्ति की खाई बेहद चौड़ी होती गई, और इसने इतनी बड़ी संख्या में लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे धकेल दिया कि जैसा पहले कभी हुआ नहीं था | इसने मुट्ठी भर भरमाये-अधाये लोगों का एक नया वर्ग खड़ा कर दिया | और इन सबसे भी अधिक इसने हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का बवंडर पैदा कर दिया | यह कहा जा सकता है कि अपने 11 साल के शासन-काल में श्रीमती गांधी ने जो किया वह नेहरु मॉडल का ही तेज अनुकरण था | हां, इतना फर्क जरूर था कि नेहरु ने लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर अपना काम किया था |

इन सबका सबसे क्रूर पक्ष यह था कि यह सारा कुछ समाजवाद के नाम पर किया गया और अतंत: यह कुछ कोंग्रेसी नेताओं के हाथ में एकाधिकारशाही बनकर सिमट गया | यही कारण था कि भारत को 1977 में एक दूसरी लोकतांत्रिक क्रांति के दौर से गुजरना पड़ा | अगर हमारे नेताओं ने एकदम शुरु से ही आर्थिक व राजनीतिक विकास का गांधी का रास्ता पकड़ा होता तो इनमें से अधिकांश दुखोंतो से बचा जा सकता था | लेकिन जो बीत गया, वह तो बीत गया ! हमें उस अनुभव से सीखना चाहिए और फिर उन्हीं गलतियों को दोहराने से बचना चाहिए | इसलिए हमारे वक्त की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हम गांधी की तरफ लौटें | जब मैंने संपूर्ण क्रांति की आवाज उठाई थी तब मेरा जोर इसी बात पर था कि हमें आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक क्षेत्रों में गहरे, बुनियादी और तेज परिवर्तन की जरूरत है | इस दिशा में पहला कदम है कि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की जाएं तथा नागरिकों को बुनियादी इकाई मान कर सरकारें चलें | आपातकाल के अनुभव ने साबित कर दिया है कि गरीब जनता एकाधिकारवादी शासन में अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकती है |

आपातकाल गया और उसके साथ ही वह शासन भी गया, तो क्या यह हमारे काम का अंत है ? नहीं, हमें संपूर्ण क्रांति का आर्थिक व सामाजिक आयाम भी खड़ा करना है और यह काम सिर्फ एक ही रास्ते से हो सकता है कि हम गांधी को समझें और उनका अनुकरण करें | सबसे कठिन यह समझना और पहचानना है कि सच में गांधी-विचार है क्या ? मैं उनके जीवन-काल में उनका अनुयायी भी था और उनका आलोचक भी था – दोनों एक साथ ! उनके जीवन के आखिरी दौर में हम काफी गरीब आए और हम एक-दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह समझ सके | फिर भी यह बात तो बहुत कठिन बनी ही रही कि गांधी के विचार और उनकी कार्य-पद्धति को कैसे समझा और समझाया जाए |

दुर्भाग्य यह भी रहा कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था अत्यंत असंतुलित ढंग से पश्चिमी शिक्षातंत्र की तरफ झुकी हुई है कि जिसमें गांधी के अध्ययन की कोई जगह ही नहीं है | हमारे यहां सैकड़ों विश्वविधालय व शोध संस्थान हैं लेकिन मैंने इनमें कहीं भी गांधी के अध्ययन के प्रति गंभीर प्रयास नहीं देखा है | गांधी सामयिक हैं या नहीं, इसका फैसला भी तो उनके विचारों और तरीकों के गंभीर विश्लेषण के बाद ही किया जा सकता है | यह अत्यंत शर्मनाक है कि उदारवादी और मार्क्सवादी, दोनों तरह के विद्धानों ने अपने घमंड में गांधी को समझे बिना ही उन्हें खारिज कर दिया |

गांधी के बारे में कोई भी गंभीर अध्ययन करते समय हमें दो बातों का ध्यान रखना ही चाहिए | पहली बात यह कि गांधी तंत्र-निर्माता-सिस्टम बिल्डर नहीं हैं लेकिन उनके पास संपूर्ण चिंतन की वह पूंजी है जिसके आधार पर आप आर्थिक व राजनीतिक विकास का सबसे उपयुक्त और सबसे आधुनिक मॉडल विकसित कर सकते हैं | हां, इतना जरूर याद रखना है कि गांधी के प्रयोगों में आखिरी बात जैसी कोई स्थिति नहीं होती है | ऐसा इसलिए है कि गांधी के विचार-तत्व परिस्थिति के साथ-साथ विकसित होते चलते हैं, न कि जड़ सिद्धांतों से बंधे, अटके व ठिठके होते हैं | गांधी खुद भी अपने निरंतर विकसित होते अनुभवों के आलोक में अपनी अवधारणाएं सुधारते, विकसित करते और समृद्ध करते मिलते हैं | लेकिन हम यह भी न भूलें कि गांधी के पास कुछ अपरिवर्तनीय आधारभूत तत्व ऐसे हैं कि जिनके आधार पर ही गांधी-प्रक्रिया काम करती है | इन्हें हम बदल नहीं सकते हैं | गांधी के ये केंद्रीय तत्व हैं : सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, सत्याग्रह, समता और श्रमोत्पादन | कोई इसमें एकाध तत्व जोड़ या कम कर सकता है लेकिन गांधी के आधारभूत तत्वों का यह समुचित प्रतिनिधित्व करता है |

दूसरी बात यह कि हमने गांधी-मॉडल का कोई तत्व जैसे ही स्वीकार किया वैसे है हम निरंतर क्रांति की उस अवधारणा से जुड़ जाते हैं जिसे मैंने संपूर्ण क्रांति का नाम दिया है | सत्याग्रह या अहिंसक संघर्ष इस क्रांति का प्राण-तत्व है | कहूं तो एक खास अर्थ में यह भी द्वंद्वात्मक है – यह व्यक्ति और समुदाय के बीच द्वंद्व या संघर्ष की बात करता है, हुक्मशाही और स्वतंत्रता के बीच, कुलीन व जनसाधारण के बीच, निजी संपत्ति और सामूहिकता के बीच, श्रम व पूंजी के बीच तथा ऐसे ही कई दूसरे संघर्षों की बात करता है | गांधी किसी चुनौती से मुंह नहीं फेरते हैं और न मार्क्स की तरह दूसरी जमीनी सच्चाइयों से मुंह मोड़ कर, केवल आर्थिक व राजनीतिक मामलों की बात करते हैं | वे मनुष्य-जीवन को उसकी संपूर्णता में देखते हैं और फिर उसे एक परिपूर्ण कार्य-दर्शन में बांधते हैं | वे इसकी भी पूरी गुंजाइश रखते हैं कि यह दर्शन अनुभव-संपन्न होता रहेगा तो बदलता भी रहेगा लेकिन जिसे सभी देख व समझ सकें, ऐसी धारावाहिकता भी इसमें रहेगी और यह एक निश्चित नैतिक धरातल पर खड़ा होगा | इसलिए कई बार लोग कहते हैं कि गांधी की संपूर्ण अवधारणा ही नैतिक-वैज्ञानिक धरातल पर खड़ी होती है |

हमारे समाज-विज्ञानी, जिनका कड़ा प्रशिक्षण एक अलग किस्म से वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने व व्याख्यायित करने के लिए हुआ है, यदि अपने सिद्धांतों व दर्शन की जांच पूरी तरह भारतीय या गांधी की कसौटी पर नहीं करते हैं तो परिणाम शून्य ही आएगा | यदि वे इन दोनों को मिलाकर चलेंगे तो कुछ नई संभावनाएं सामने आ सकती हैं | मैं आशा करता हूं कि भारतीय बौद्धिक, चाहे वे क्षेत्र में उतरकर सीधे शोध करने वाले हों कि संस्थानों में अध्ययन-अध्यापन में लगे हों, भारत की करोड़ों मूक जनता की जरूरतों और समस्याओं को सामने रखकर उनका भारतीय संदर्भ में हल खोजेंगे और दिल-दिमाग इतना खुला रखेंगे कि चाहे जहां से भी उपयुक्त विचार आता हो, उसे वे कबूल करें |

गांधी की स्वदेशी की अवधारणा बेहद उल्लेखनीय है | यहां वे उस द्वंद्व को सुलझाने की कोशिश करते हैं, जो आत्म-निर्भरता और वैश्विकता के बीच दिखाई देती है | गांधी के लिए ऐसा कोई द्वंद्व है ही नहीं | उनके लिए द्वंद्व का मतलब दो ऐसे ध्रुर्वों को मिलाने की कोशिश नहीं है कि जिनके बीच कोई सुसंगतता नहीं है | वे सत्याग्रह व जन संघर्ष द्वारा दो द्दंद्दात्मक ध्रुर्वों को इस तरह मिलाने या बदलने की कोशिश करते दिखाई देते हैं कि उनका उदिष्ट निकल आए | इसलिए हमें आज किसी भी दूसरी चीज से अधिक गांधी के स्वदेशी की इस तकनीक की जरूरत है | इसलिए ही संपूर्ण क्रांति की मेरी अवधारणा गांधी की पूर्ण स्वराज्य की अवधारणा से जुड़ जाती है, स्वदेशी जिसका एक आयाम है |

हमारे देश के बौद्धिक-जन संपूर्ण क्रांति की मेरी अवधारणा को एक सुनिश्चित व व्यवस्थित दिशा दे सकेंगे तो यह मेरे एक सपने की पूर्ति सरीखा होगा | मैं चाहता हूं कि हमारे समाजविज्ञानी इस दिशा में कार्यशील हों तथा संपूर्ण क्रांति को गांधी-तत्व से परिपूर्ण करें, क्योंकि मेरे लिए दूसरा कोई तत्व इसके लिए उपयुक्त हो ही नहीं सकता है | अब एक शब्द भारतीय मार्क्सवादियों के बारे में भी कहना असंगत नहीं होगा | उन्होंने लेनिन व स्टालिन की अवधारणाओं से इतना कुछ ग्रहण कर लिया है कि वे भारतीय जनसाधारण से कटते जा रहे हैं और अधिकांश निर्णायक अवसरों पर बाह्य ताकतों के पिछलग्गू नजर आते हैं | माओ ने स्टालिन के रूप के संदर्भ में चीन की दिक्कत समझी थी और मार्क्सवाद की सूरत ही बदल दी थी | माओ ने चीन के संदर्भ में जो सच्चाई समझ ली थी वही सच्चाई हमारे मार्क्सवादियों को भारत के संदर्भ में समझने की जरूरत है कि माओ का मॉडल भारतीय समाज की समस्याओं का हल नहीं बतला सकता है | दुर्भाग्य यह हुआ है कि भारतीय मार्क्सवादियों की नई पौध पुराने मार्क्सवादियों से अलग कोई रास्ता नहीं खोज सकी है | वह यह नहीं समझ सकी है कि हमारे देश का रास्ता गांधी से होकर गुजरात है | माओ का रास्ता भारत के लिए उसी तरह अनुपयुक्त है, जिस तरह स्टालिन का रास्ता चीन के लिए था |

जे.डी.सेठी की पुस्तक ‘गांधी टुडे’ की भूमिका से साभार
सौजन्य : गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर २०१८