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कहाँ हैं गांधी का प्रभाव ?
कुमार प्रशांत

“गांधी का प्रभाव?... कभी हिमालय से पूछा है किसी ने उसका प्रभाव!” – जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

कई लोग, कई तरह से घुमा-फिरा कर पूछते हैं कि क्या गांधी अब और आज संभव हैं? कहां है गांधी का प्रभाव? ...ऐसा ही कुछ किसी ने जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से पूछा था और जवाब में उन्होंने कहा थाः “गांधी का प्रभाव? कभी किसी से हिमालय के प्रभाव के बारे में पूछ कर देखा है?” यह वह जवाब है जो कोई बर्नार्ड शॉ ही दे सकते थे। लेकिन एक जवाब और भी है जो जसिंडा आर्डर्न ने बिना किसी के पूछे, और बिना किसी का मुंह ताके ही दिया है। जवाब यह है कि हमारे भीतर गांधी आज और अभी भी जिंदा रह सकता है अगर हम इंसान बन कर जिंदा रहना सीखें।
तारीख थी 5 मार्च 2019; शहर था न्यूजीलैंड का क्राइस्टचर्च; दिन था जुम्मे का यानी शुक्रवार... क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में नमाजियों की भीड़... कि तभी अंधाधुंध गोलियां चलीं... 50 जिंदा लोग वहीं-के-वहीं लाशों में बदल गए... घायलों की संख्या बहुत अधिक...यह सफेद चमड़ी वालों का न्यूजीलैंड के मुसलमानों पर आतंकी हमला था। यह वही न्यूजीलैंड है जो अपेक्षाकृत शांत व हिले-मिले समाज का उदाहरण माना जाता है। ...धर्म को निशाना बनाकर ऐसा आतंकी हमला वहां पहले हुआ नहीं था। सब सकते में थे... कि तभी काले कपड़ों वाली वह स्त्री देश के रंगमंच पर उभरती है। उसकी आवाज में न कोई घबराहट है, न कंपन! दर्द है बेपनाह- इतना कि उस दर्द की आवाज सारी दुनिया ने साथ-साथ सुनी, एकदम साफ और सुलझी हुई: “ठीक है कि तुमने हमें चुना है लेकिन हम तुम्हें नहीं चुनते हैं। हम तुम्हें अभी-के-अभी खारिज करते हैं और तुम्हारी घोर भर्त्सना भी करते हैं।” –
यह जसिंडा आर्डर्न है। 37 साल की, दुनिया की सबसे छोटी उम्र की प्रधानमंत्री- न्यूजीलैंड की दूसरी महिला प्रधानमंत्री । इसमें सबसे छोटा होना कि प्रधानमंत्री होना कि महिला होना, यह सब कुछ भी खास नहीं है। खास है घोर विपदा के इस समय भी सहज साहस के साथ, घृणा से भरे अपने ही देश के, अपने ही रंग के आतंकियों को संबोधित करनाः इस दर्दनाक हादसे की जड़ में जातीय घमंड और इस्लामोफोबिया का जहर है/ वे बोलीं : (आप आगे कभी भी इन हत्यारों का नाम मेरे मुंह से नहीं सुनेंगे... मारे गए लोगों के परिजनों को गले लगाकर वे देर तक रोती भी रहीं और उनसे अपनी प्रतिबद्धता भी जाहिर करती रहीं। काले स्कार्फ से अपना सिर ढके जब वे देश के मुस्लिम नेताओं के बीच आईं तो उनसे पूछा: 'आप मुझे बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए। इस वक्त हमारी दिशा आपको ही निश्चित करनी है! अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने फोन पर संवेदना दी और पूछा कि आपको अमरीका से क्या मदद चाहिए? जसिंडा ने भाव भरे स्वर में मजबूती से कहाः “दुनिया भर के मुसलमान समुदाय के लिए सहानुभूति और प्यार चाहिए! अगले दिन अपनी संसद को संबोधित करते हुए जसिंडा ने अरबी संबोधन 'अस्लामवालेकुम” से अपनी बात शुरू की और कहा कि फेसबुक पर जिस तरह हमले की तस्वीरें डाली गई हैं और घृणा फैलाई गई है, उसकी जानकारी हमें है। “इन तकनीकी माध्यमों को घृणा फैलानें के संदर्भ में अपनी जिम्मेवारी उठानी ही होगी।” ...अगले दिन ही जसिंडा ने वह किया जिसे करने की कोई सोच भी नहीं सकता था, खास कर अमरीका। उन्होंने सारी पार्टियों को एकमत कर, अपने देश के हथियार कानून (गन लॉ) में ऐसा बदलाव किया कि एसॉल्ट राइफलों और फौजी स्तर के अर्ध-स्वचालित हथियारों पर पूरी तरह रोक लग गई। जसिंडा ने कहा कि यह वक्त जबानी जमा खर्च का नहीं है, मैं चाहती हूं कि हमारे वक्त की इस सबसे जटिल समस्या का सामना करने में हमारा देश नैतिक नेतृत्व की भूमिका में सामने आए। हमारी एक ही भूमिका होनी चाहिए, और दरअसल हमारी एक ही भूमिका है कि हम परिवर्तन की ताकतों के आगे रहें। हां, मैं दुनिया बदलने का हौसला पालती हूं लेकिन इसके लिए मुझे किसी पद की आस नहीं है। उन्होंने आगे कहा: “यह सहिष्णुता का नहीं बल्कि उससे आगे, साथ जीने का सवाल है। इस आतंकी हमले में मारे गए सारे लोगों के अंतिम संस्कार का पूरा खर्च सरकार उठाएगी, और उन पर आश्रित लोगों की भविष्य में मदद भी हमारी जिम्मेवारी होगी। ...जो हुआ वह अब हमारे इतिहास में दर्ज हो चुका है। यह हमारे राष्ट्र का सबसे अंधेरा दौर है। अब लौटने का नहीं, आगे जाने का ही रास्ता हमारे लिए बचता है। यह हमला हम पर इसलिए हुआ कि हम जैसे हैं वह उन्हें सुहाता नहीं है। लेकिन हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, हम बदलने वाले नहीं हैं।”
आतंकवादियों का मुकाबला उनसे बड़ा आतंकवादी बनकर किया जाए, यह अमरीकी शैली उन सबको मुबारक हो जिन्हें लाशों से लाशें बदलने का शौक है। जसिंडा जैसे लोग भी हैं कि जो लाशों के इस खेल को पार कर वहां पहुंचना चाहते हैं जहां जीवन गढ़ा जाता है। यह गांधी का रास्ता है, गांधी की मंजिल है। हमारी आत्मा बदला लेने की ताक में ही कायर बन जाती है, मलिन व अशांत रहती है। ऐसी आत्मा आतंकियों का मुकाबला नहीं कर सकती है। जसिंडा ने चरम संकट के पल में असाधारण धीरता व वीरता का परिचय दिया। किसी ने पूछा: जसिंडा में यह असाधारणता कहां से आई? जवाब मिला: इसलिए कि वह औरत है! औरतपन में ऐसी ताकत होती ही है!
दया नहीं, घृणा नहीं; हिंसा नहीं, बदले की भावना नहीं; अन्याय नहीं, अनैतिकता नहीं; झूठ नहीं, फरेब नहीं; चोरी नहीं, सीनाजोरी नहीं; कामचोरी नहीं, धोखा नहीं। यह सब नहीं और फिर भी जीने से भागना नहीं, यह है गांधी की दिशा! यह हो और हम यह कर सकें तो गांधी का प्रभाव देख भी सकेंगे और आंक भी सकेंगे।

सौजन्य : गांधी मार्ग, मार्च-अप्रैल २०१९